तुम्हें अच्छा नहीं लगा!



मुझे तुम पर आज गुस्सा आया, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मैं खुद को पीछे करता गया। मैं आज तुम्हें कुछ दिखाना चाहता था जिसके लिए मेरी उम्मीद काफी बड़ी थी कि तुम उसे देख भावुक हो जाओगी। पर तुम हो कि अपने में खोई रहती हो। तुम्हारी एक ‘न’ ने मुझे हैरान कर दिया और चोट सीधे मेरे दिल में जाकर लगी। यह एक इंसान को शायद ही सुकून पहुंचाये कि जिसे वह सबसे अधिक चाहता है, वह उसे इस तरह कह दे।

खैर, तुम नहीं जानती कि तुमने मुझे फिर से चुप रहने और चुप ही रहने को विवश कर दिया। कई दिनों से मैं खूब बोल रहा था। चलो आज चुप हूं काफी समय से। यों कह लो कि मुझमें ‘सीरीयसनैस’ आ गयी है।

वैसे तुम खुद कितनी सीरीयस हो और तुम्हारा चेहरा देखकर ही कोई यह कह सकता है कि तुम किसी ग्रह की कोई भटकी हुई ‘परेशान आत्मा’ हो।

एक बात मैंने आज तुमसे सीखी-‘‘जो चीजें आपको अच्छी लगती हैं, जरुरी नहीं कि वह दूसरों को उतनी ही भायेंगी। लोगों के विचार अलग-अलग होते हैं क्योंकि विचार मन से उचरते हैं।’’

ये विचार बूढ़ी काकी मुझसे कहती है, लेकिन उसका असर मुझपर अधिक ही हो रहा है कि मैं बुजुर्गों की तरह कई बार विचार बना जाता हूं। भई, काकी मुझे जीवन के विषय में इतनी बारीकी से जो बताती है।

-harminder singh