एक कैदी की डायरी -13

मैं ‘बेचारा’ कहलाना नहीं चाहता। इस शब्द से मुझे नफरत है। लोग कहते हैं कि मजबूर की मदद करो। मुझे लगता है कोई मजबूर नहीं। सब हालातों के हाथ कठपुथली हैं। इस हिसाब से सारा संसार किसी न किसी मौके बेचारा है। फिर मैं भी एक बेचारे से कम नहीं, लेकिन मैं खुद को बेचारा नहीं कहना चाहता। मैं हौंसले से जीवन की सच्चाई का मुकाबला करना चाहता हूं। पर यह कठिन लगता है। मैं अपनों से बहुत दूर हो कर भी उनके पास हूं, पर उनकी याद के सहारे धुंधले पड़ गए हैं। मेरा संसार रुका हुआ सा हो गया है, उधड़ा हुआ सा हो गया है। एक अजीब सी कशमकश फिर से उभरी है। शायद उभरती रहेगी टीस बनकर।

सहारे की तलाश जीवन भर रहती है। इंसान सहारा चाहता है। बिना सहारे के शायद जीवन अधूरा है। अपनों का सहारा मिलता है तो बहुत बेहतर होता है। मेरे पास कोई नहीं जो संभाल सके। जब हम निराश होते हैं, दुखी होते हैं तब हमें ऐसे व्यक्ति की तलाश रहती है जो हमें हौंसला दे सके और हमारे दर्द को समझ सके। मुझे कई लोग ऐसे मिले जो मेरे काफी करीब आये, लेकिन वे मुझसे दूर चले गये। उनकी कहानी भी मेरी ही तरह थी। जब कभी अधिक निराश होता हूं तो इस गीत को गुनगुनाता हूं-

''जिंदगी कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है।''

-to be contd....

-Harminder Singh

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