एक कैदी की डायरी -16

सादाब की कहानी अभी पूरी कहां हुई थी। यह उसके जीवन का सच था जो शब्दों के द्वारा बयान किया जा रहा था। उसके एक-एक शब्द को मैंने सहेज कर रखा है ताकि उन्हें अपनी यादों के साथ मिला सकूं। सादाब ने आगे कहा,‘‘उस समय मैंने सोचा था कि मैं बड़ा आदमी बनूंगा। अब्बा रिक्शा चलाते थे। जितनी मेहनत, जितनी सवारियां, उतने पैसे नसीब होते। गरीबों का जीवन दुश्वारियों से भरा होता है। गरीब होना संसार का सबसे बड़ा दुख है। एक-एक पैसे की कीमत कितनी होती है, यह भला गरीब से ज्यादा कौन जान सकता है। हम भूखे कई बार सोये हैं। अम्मी ने हम बच्चों को गोद में बिठाया, कहानी सुनाई, थपका और सो गये। आदत हो गयी थी भूख से लड़ने की भी। भूख संघर्ष करना सिखाती है, जीवन से लड़ना सिखाती है, हताशा और निराशा को अपनाना सिखाती है। हम भी धीरे-धीरे सीख रहे थे।’’

आज रात बहुत हो गई। मैं बहुत कुछ लिख चुका हूं। मन करता है सादाब के बारे में उसका कहा और लिखूं। उसने कहा,‘‘पुलिस वालों ने मेरे अब्बा को एक बार बहुत मारा था। अम्मी उस रात अब्बा के पास बैठी रही थी। अब्बा से एक पुलिस वाले ने माचिस मांगी। उनके पास नहीं थी। वे बीड़ी-सिगरेट-शराब से दूर रहते थे। पांच वक्त की नमाज छोड़ते नहीं थे। लोग उन्हें सच्चा मुसलमान कहते। अब्बा से उस पुलिसवाले ने कहा कि सामने पान की दुकान से माचिस लेकर आ। सीधे-स्वभाव वे एक माचिस ले लाए। फिर उसने कहा कि सिगरेट कौन लाएगा? उसने एक भद्दी गाली दी। अब्बा बोले कि तुमने माचिस को कहा था। इसपर उस पुलिसवाले ने उनके एक चांटा जड़ दिया। अब्बा कमजोर थे, पीछे के बल गिर पड़े। कुछ देर बाद रिक्शा का हैंडल पकड़ उठ खड़े हुए। नीचे मुंह कर रिक्शा ले जाने लगे। पुलिसवाले ने उनकी पीठ पर हाथ मारकर कहा कि अब सिगरेट लेकर आ। अब्बा ने इंकार कर दिया। वे ऐसी नशे की चीजों को हाथ नहीं लगाते थे। न ही उन लोगों के पास बैठते थे जो नशा करते। उस पुलिसवाले ने अब्बा का रिक्शा एक किनारे खड़ा करवा दिया। अब्बा के मुंह पर जोर का थप्पड़ फिर जड़ दिया। अबकी बार अब्बा खड़े रहे। उनका चेहरा लाल हो गया था। उन्हें भी बहुत गुस्सा आ रहा था। उन्होंने अपनी दोनों मुट्ठियां भींच ली थीं। अब जैसे ही पुलिसवाले ने उनपर हाथ उठाया उन्होंने उसे रोक लिया। पुलिसवाला सन्न रह गया। तभी पुलिस की जीप वहां आकर रुक गयी। अब्बा वैसे ही खड़े रहे। पुलिसवाले ने जीप के अंदर झांका और थोड़ी देर बात की। अब्बा उन्हें देखते रहे। कुछ देर में अब्बा को पुलिसवाले जबरदस्ती जीप में डालकर ले गये। आखिर वर्दी के सामने एक गरीब आदमी कर ही क्या सकता है? थाने में ले जाकर उन्हें एक बड़ी टेबल पर उलटा लिटा दिया गया। उनके हाथ-पैर कस कर बांध दिये गये। अब्बा बार-बार उनसे रहम की भीख मांगते रहे। मगर जालिम हंसते रहे, ठहाके लगाते रहे। वे चार पुलिसवाले थे। उनके चेहरे को अब्बा कभी नहीं भूल सकते थे। यह गरीब की किस्मत थी कि वह मजबूर था। इंसान की मजबूरी का कुछ इंसान ही फायदा उठा रहे थे। कैसी बीत रही होगी अब्बा पर? मुझे उस वाकये को अपनी अम्मी से सुनकर बड़ा गुस्सा आता था। अम्मी कई बार अब्बा के बारे में हमें बताती थी।’’

मैंने सादाब से पूछा कि उसके अब्बा को पुलिसवालों ने कब तक थाने में रखा। इसपर सादाब का चेहरा लाल हो गया, वह बोला,‘‘कमबख्तों ने बहुत मारा अब्बा को। गालियां दीं, जो जी में आया वह कहा। पुलिसवाले शराब पीते रहे, सिगरेट सुलगाते रहे। अब्बा के बालों को पकड़कर एक सिपाही बोला कि अब खुश है तू। अब्बा के मुंह से खून बह रहा था। उनकी पीठ चमड़े की बेल्ट की चोट से छिल गयी थी। ऐड़ियां सूज गयी थीं और पैर की तलियां खून से लथपथ थीं। ऐड़ी से खून पैर के किनारे होता हुआ अंगूठे के सहारे जमीन पर टपक रहा था। अब्बा बेहोश हो चले थे। पुलिसवालों ने अब्बा की पीठ पर शराब की आधी बोतल उडेल दी। अब्बा तिलमिला उठे। फिर बेहोश हो गये। शायद वह समय कठिन था। कठिन इतना कि सहना मुश्किल था। हम बर्दाश्त करते हैं, लेकिन हर किसी की हद होती है। हद तक उतना खराब नहीं रहता। हद पार होने पर बहुत कुछ बदल जाता है। अब्बा को सड़क किनारे बेहोशी की हालत में फेंक दिया गया। अम्मी बेखबर थी। अब्बा रात में रिकशा चलाते थे। दिन में कुछ घंटे मजदूरी करते थे। परिवर का पेट पालने के लिए क्या नहीं कर रहे थे हमारे अब्बा।’’

सादाब की बातें दिल को झकझोर रही थीं। मैं भावुक हो गया था। सादाब के परिवार को कितना कष्ट हुआ होगा। कष्ट हमें जीवन से रुसबा होने पर विवश कर देते हैं। आंखों के गीलेपन में एक गहराई थी जिसे मैं देख रहा था। फिर कई बूंदें छलकीं जिनसे कुछ तसल्ली मिली। अक्सर घने दर्द के बाद इसी तरह राहत मिलती है। हृदय की वेदना सिमटी रहती है- उसका बाहर आना जरुरी है। पिघलती हुई कोई चीज बूंद बनकर ही तो गिरती है। विचार पिघलते हैं ताकि मन हल्का हो सके, हृदय का भार कम हो सके।

सादाब की कहानी की अभी शुरुआत भर थी। उसके शब्दों को मैं आंखों के आगे तैरता पाता हूं। उसकी बताई हर एक घटना मानो साक्षात हो रही थी। उसके अब्बा ऐसे ही सड़क के किनारे पड़े रहते यदि पड़ोस में रहने वाला हरप्रसाद उन्हें न देखता। हरप्रसाद एक रिक्शावाला था। उसने उन्हें पहचान लिया। रिक्शा पर लादकर उन्हें घर पहुंचाया।

खून से लथपथ परिवार का मुखिया बेहोशी की हालत में एक चारपाई पर डाल दिया जाता है। सादाब की अम्मी चीख पड़ी। शौहर की हालत को देखकर वह गश खाकर गिर पड़ी। हरप्रसाद ने तुरंत सादाब की अम्मी को संभाला। रुखसार और जीनत भी पास खड़े रो रहे थे। जीनत ने अम्मी को पानी पिलाया। उधर उनके अब्बा को होश आ चुका था।

सादाब ने कहा,‘मुझे हैरानी हो रही थी कि यह सब क्या हो रहा है। सब रो क्यों रहे हैं? अब्बा-अम्मी अजीब से हो रहे हैं। मैं अब्बा के हाथ से चिपक कर उनकी चारपाई के नजदीक बैठ गया। उनका हाथ खून से सना था। जख्मों पर घर में रखा थोड़ा सरसों का तेल लगा दिया। हमारे पास इतने पैसे कहां थे? रोज की कमाई कितनी होती होगी। अगर ऐसा होता तो अब्बा खुद का रिक्शा न खरीद लेते। ईद दो दिन बाद थी। हमारे लिए सब दिन एक-से थे, सारी रातें सूनी थीं। फीका जीवन जीते-जीते हम जायका भूल चुके थे। जीनत और रुखसार बार-बार आंसू पोछ रही थीं। बीच-बीच में हिचकी लेती थीं। कितनी दुखी थी वे दोनों और अम्मी। घर में सब सुबक रहे थे, तो मैं भी वैसा ही कर रहा था। अब्बू मेरी तरफ देखकर कुछ बोलना चाह रहे थे। उनके होंठ केवल फड़फड़ा रहे थे, कह नहीं पा रहे थे। चेहरे पर कई चोटें थीं जिनसे उनका चेहरा सूज गया था। अम्मी ने जीनत से कहा कि हमें सुला दे। उस रात पता नहीं क्यों में अम्मी के बिना सोया था। सुबह उठा तो देखा कि अम्मी दहाड़े मार-मार रो रही थी। मेरे अब्बू........मेरे अब्बू चल बसे थे। हम आधे यतीम हो गये थे। जब कमाने वाला चला जाए तो परिवार के लोगों के फाके से भी बदतर हालात हो जाते हैं। अम्मी बेसुध सी हो गयी थी। वह पागलों की तरह बड़बड़ाती रही। कुछ देर चुप होकर रोनी लगती, फिर बड़बड़ाना शुरु कर देती। जनाजे में कम लोग थे क्योंकि कोई बड़ा आदमी थोड़े ही मरा था, एक मामूली रिक्शावाले की मौत हुई थी। मगर हमारे लिए अब्बा मामूली नहीं थे। बहुत चाहते थे हम सबको। ईद हम कैसे मना सकते थे। यहां रंज था, वहां खुशियां राज कर रही थीं। अब्बा का सफर बस इतना ही था। जन्नत के दरवाजे ऐसे लोगों के लिए हमेशा खुले रहते हैं। दोजख में वे लोग जाएंगे जिन्होंने अन्याय किया है। अब्बा के साथ अच्छा नहीं हुआ। उन जालिम पुलिसवालों को शायद नरक में भी जगह नसीब न हो। भटकेंगे तमाम जिंदगी दुख में और मरने के बाद भी। जाने कितने परिवारों को तबाह किया होगा उन लोगों ने। खुद चैन की नींद न सो पायेंगे। दूसरों का दर्द उनके लिए तमाशा होता है। हंसते हैं वे हमारे जैसों पर। गरीबी का फायदा उठाते हैं। कमजोर को और कमजोर करते हैं। बनते हैं कानून के रखवाले। ऐसे रखवालों से अच्छा है, हमें पैदा होते ही उठा ले। कम से कम उनके जुल्मों से तो निजात मिलेगी।

-to be contd....


-Harminder Singh

1 comment:

  1. पुलिसिया जुल्मो-सितम की रोंगटे खडे कर देने वाली बर्बर दास्तान...

    टोपी पहनाने की कला...

    गर भला किसी का कर ना सको तो...

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