मन की पीड़ा

पीड़ा है मन की,
मन में ही रहे,
जख्म गहरें हैं,
नासूर बन रहे।

अश्रु नीर बह गये,
निर्झर धार जैसे बहे,
पीर घनेरी है मन में,
मन कुंठित सहे,
हृदय आवेग, क्षोभ स्फुटित है,
मन की शंका क्या कहे,
विवाद याद हैं ही,
स्मरण ज्वाला बन रहे,
भुलाता तो मन नहीं,
समर जो मन में बहे।

पीड़ा है मन की,
मन में ही रहे,
जख्म गहरें हैं,
नासूर बन रहे।

पतझड़ अब हो गया,
ठूंठ क्यों बचा रहे,
अग्नि में जल जाए,
जब पात ही न रहे,
शांति क्षुब्ध हो गयी,
अशांत सागर ही बहे,
भ्रमित स्वप्न जीवन का,
देख-देख जी रहे,
कटोरा अमृत का समझ,
लहू घूंट पी रहे।

पीड़ा है मन की,
मन में ही रहे,
जख्म गहरें हैं,
नासूर बन रहे।

-harminder singh

6 comments:

  1. ओह! क्या कहें...

    ReplyDelete
  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 19 - 04 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  3. पतझड़ अब हो गया,
    ठूंठ क्यों बचा रहे,
    अग्नि में जल जाए,
    जब पात ही न रहे,
    शांति क्षुब्ध हो गयी,
    अशांत सागर ही बहे,
    भ्रमित स्वप्न जीवन का,
    देख-देख जी रहे,
    कटोरा अमृत का समझ,
    लहू घूंट पी रहे।
    gahri baat

    ReplyDelete
  4. kya baat hai samvedanaon se itani pragadhata kaise? achhe shilp ka unaman, aagaj bhi achhe hain .bahut sundar prayas . badhayi.

    ReplyDelete
  5. अथाह दर्द का सागर.....
    मार्मिक , भावपूर्ण रचना

    ReplyDelete
  6. pahli bar apko padha...bahut acchha likhte hain aap. shabdo ka chayan sateek hai. prabhavshali rachna.

    ReplyDelete