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एक कैदी की डायरी -37

jail diary, kaidi ki diary, vradhgram, harminder singhपिताजी के शरीर को देखकर लगता था कि उन्हें बेरहमी से मारा गया है। उनकी पूरी कमीज लाल हो गयी थी। भरे मन से मैंने उनकी आंखें बंद कीं। उनकी आंखों में अब कुछ नहीं था और मैं उन्हें देख रहा था। मैं उनसे कुछ कहना चाहता था, शायद बहुत कुछ। पर वे सुन नहीं सकते थे। बेजान थे वे।

शीला ने हमारा घर उजाड़ दिया था। धोखेबाज निकली वह। एक स्त्री के कारण, उसके मोह के कारण काली छाया ने सबको डस लिया। पिताजी ने उसे निकाल बाहर करने की कोशिश की लेकिन वह इतनी जहरीली निकली कि वे बच न सके। काली छाया अपनी मनमानी कर चलती बनी। काले टुकड़ों की चोट ने तबाही का मंजर दिखाया। सिसकती आवाजों को यूं ही छोड़ दिया गया।

इतने साल बाद मैंने अपने जख्मों को हवा दी है। अब इनपर कभी मरहम नहीं लाऊंगा। हवा लगने दूंगा ताकि दुनिया के सामने पूरी कहानी आ सके। मैं जानता हूं कि इंसान पैदा हो जाता है और मर जाता है। हर व्यक्ति की जिंदगी दूसरे से अलग है। कुछ लोग मेरे जैसे होते हैं जो सच से नहीं घबराते। मैं जानता हूं कि अगर हम अपने बारे में लिखना चाहें तो कहानी इतनी लंबी बन जाएगी कि वह कभी खत्म नहीं होगी। जिंदगी इतना कुछ कह जाती है कि उसे पढ़ा नहीं जा सकता, बस शब्दों के जोड़-तोड़ से उसके मामूली अंश को कहा जा सकता है। वाकई हैरान करती है जिंदगी -जीने से पहले भी, जीते हुए भी और मरने के बाद भी।
-जारी है

-Harminder Singh


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