Header Ads

आपकी दामिनी!

समाज नहीं बदलेगा यह मैं जानती हूं..
मैं दुनिया से चली गयी। लगने भी लगा था कि अब जीकर क्या करुंगी। जिंदा लाश बनकर भी जीना कोई जीना होगा। जिंदगी उजाड़ दी थी मेरी उन दरिंदों ने। क्या मिला उन्हें ऐसा कर?

  सब कुछ तो ठीक चल रहा था। कितनी खुश थी मैं। परिवार और दोस्त, कितनी चहकती थी मैं। उम्मीदें थीं बड़ी, ऊंचा उड़ने की। मैं भी सफलता का शिखर छूना चाहती थी। मैं भी ढेरों खुशियां समेटना चाहती थी। सपना था मेरा कि कुछ ऐसा करुंगा जो कल्पना से परे हो।

  उस मनहूस काली रात ने मेरा जीवन तबाह कर दिया। वे पल थे ही ऐसे।

  फिर पूछती हूं उनसे, कि हासिल क्या किया उन्होंने किसी की अस्मत से खिलवाड़ कर। क्या उनके परिवार में कोई लड़की नहीं? क्या उनकी कोई बहन नहीं?

  ढेरों सवाल हैं जिनका उत्तर शायद उनके पास न हो, लेकिन किसी की जिंदगी वीरान कब की हो चुकी और खामोश हो गया कोई सदा के लिए।

वृद्धग्राम की प्रस्तुति : समय पत्रिका
Samay Patrika January 2013 issue....Read Online or Download free

  समाज नहीं बदलेगा यह मैं जानती हूं। हम वैसे ही रहेंगे। खौफ बराबर मंडराता रहेगा हम लड़कियों पर। थोड़ा शोर होगा बस, फिर सब खामोश! क्या लड़की होना इतना बड़ा जुर्म है? क्या लड़की होने की सजा यही है?

  हर पल मरती हैं मेरे जैसी जाने कितनी। उनकी खामोश आंखें मजबूर हैं। शरीर को नोचने वाले उनके सामने नाच रहे हैं, घूर रहे हैं। झेप रही हैं लड़कियां, छिप रही हैं उनकी नजरों से। क्या करें औरत जात हैं, अस्मत महफूज सब महफूज।

  दर्द से सिसकती जिंदगियां अपना बयान दर्ज नहीं करा सकतीं क्योंकि समाज की बेड़ियां और परिवार का वास्ता उन्हें ऐसा नहीं करने देना चाहता। समाज हमें सिखाता है हमारी हदें। यह कौन सा समाज है? कैसा समाज है? क्या उनके लिए कोई हद, कोई बेड़ियां नहीं जो औरत जात को मांस का लोथड़ा भर समझते हैं -नोचना है जितना उतना नोचो। गिद्धों की तरह झपटने की सोच रखने वालों को समाज क्यों नहीं बांधता?

साथ में पढें : अब बहुत हो चुका

  जो मेरे साथ हुआ, वह किसी के साथ न हो। मैं कितनी टूटी यह मुझे ही पता है। पर इसमें मेरे परिवार का, मेरे अपनों का क्या दोष था जो वे भी सिसके। सिसका सारा देश। हर मां ने अपनी बेटी को गले से लगाया और कहा होगा,‘भगवान करे ऐसा किसी के साथ न हो।’ उन्हें ऐसा इसलिए कहना पड़ा क्योंकि बहशियों ने दरिंदगी की हदें पार कर दी थीं। न मुझे जिंदा छोड़ा, न मरा, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब किसी के लिए कहने को कुछ बचा नहीं। सब खामोश हैं, खामोश है सारा देश। चली गयी मैं, रोती, सुबकती और दर्द से कराहती तथा मौत से जंग लड़ती हुई। हां, कुछ अपनों को दर्द असहनीय होगा मेरी मौत का, लेकिन लगता था और शायद भगवान भी यही चाहता होगा कि मेरा जीना किसी मतलब का नहीं था। इसलिए उसने मुझे अपने पास बुला लिया।

  मैं वापस नहीं लौटूंगी यह मैं ही नहीं, सभी जानते हैं।

  एक चिंगारी जरुर उठी है सोये हुए लोगों में कि लड़की होना जुर्म नहीं। उसे भी हंसने-खेलने का हक है, सपने हैं उसके भी। भरोसा है मुझे कि मेरी जद्दोजहद के बाद हुई मौत बेकार नहीं जायेगी। बदलेगा कुछ न कुछ। बेटियां सिर उठाकर चल सकेंगी और उनकी ओर आंख उठाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पायेगा।

  हां, तब मेरी आत्मा को सुकून मिलेगा।

  आपकी दामिनी!

-Harminder Singh


No comments