क्या यही जिंदगी है?

life, vradhgram

दर्द भरे अल्फाजों का जिक्र मैं करना नहीं चाहता। जिंदगी बेनूर भी लगती है। मगर एक खूबसूरती सिमटी है यहां भी। एक अनोखी अदा जिसका कायल हुआ है सारा जहां। खिलती हुई कलियों को सिराहने रखने से चीजें मुक्कमल होती नहीं दिखतीं, लेकिन महकती रुहें कमाल की लगती हैं।

  बूंदों की बनावट को देखता हूं तो खुद को समझा हुआ पाता हूं कि जिंदगी अब मुझसे क्या पूछेगी? सवाल और उनके जबाव ढूंढती जिंदगी की कहानी में रुकावटों का दौर जारी है। बस हूं तो मैं, तन्हाइयों से जूझता।  

उस तरावट की खोज कर रहा हूं जो कभी आसपास बसती थी। मुश्किल होते हुए भी आसानी लहराती थी। उम्र की बानगी ही कुछ ओर थी।

  एहसासों की कब्र पर फूल बिखरे हैं। मन थोड़ा नाजुक हो चला है। थक कर लगता है, जैसे ओर चलने का मन नहीं करता। तलाश थी कितनी जो पूरी हुई। राह अभी जारी है। क्या यही जिंदगी है?

कुछ कहने का मन है:

’‘वक्त और मैं,
अकेलापन अनजाना,
सितम जिंदगी का,
कोना सूना, वीराना।’’

-Harminder Singh

5 comments:

  1. बहुत अच्छी जानकारी

    ReplyDelete
  2. यह तलाश शायद कभी पूरी नहीं होती किसी की मगर यदि एक मकसद को लेकर जीवन जिया जाये तो कहते हैं वो आसान हो जाता है तो फिर क्यूँ न इस तलाश को ही मक़सद बना लिया जाये। ...

    ReplyDelete
  3. सुन्दर ,एक मुकाम पर आकर ज़िन्दगी सवाल तो पूछती ही है.और तब बैठकर यह मूल्यांकन करना ही होता है,कि मैंने क्या खोया क्या पाया. सुन्दर

    ReplyDelete
  4. सुन्दर ,एक मुकाम पर आकर ज़िन्दगी सवाल तो पूछती ही है.और तब बैठकर यह मूल्यांकन करना ही होता है,कि मैंने क्या खोया क्या पाया. अक्सर मैं भी ईद दौर से गुजरता हूँ जब फुर्सत में होता हूँ.और उसकी कतई कमी नहीं.

    ReplyDelete
  5. गद्य भी पद्यमय हो गया है ...हाथ में कलम है तो शिल्पी हैं आप ...

    ReplyDelete