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कोयल तुझे ढूंढ रहा मेरा मन

तू काली है। मीठी बोली वाली है। जीवन में मिठास तू ही घोल रही है। तेरा चहकना कितना भाता है। कहां गयी तू कोयल रानी। तुझे ढूंढ रहा है मेरा मन। दिशा-दिशा तलाश रही मेरी आंखें। नजर नहीं आती तेरी एक झलक भी। ऐसा क्यों? कहां गयी तू?

बादलों को आते-जाते देखा मैंने। फिर सूरज को इठलाते हुए भी देखा। तपती दोपहरी में तुझे निहारा। खड़ा रहा, पसीना-पसीना होकर, पर तू नहीं दिखी। सूरज की पहली किरण से तेरा इंतजार था। दोपहर से शाम हो गयी, मैंने खोज जारी रखी। अकेला था, दल नहीं, न कोई अभियान। आम के बाग देखे, पत्तों की हरियाली छानी। तेरा सुर नहीं, तू नहीं मिली कोयल रानी।

लगता है मिठास खत्म हुई जीवन की। फीकापन है संसार में। बासीपन के साथ अधूरापन भी। तू कहीं खो गयी इसी वजह से। तुझे नहीं भाया यह सब। पर बताकर तो जाती। एक कूक ही काफी थी। दिल तोड़ गयी, खफा हो गयी।

चल जा, तुझे जाना था। नहीं हासिल होगा कुछ यहां क्योंकि नीड़ नहीं रहे बाकि।

उड़ चली, बिन बताये तू कहीं,
पंछी है, पंख मिले विरासत में,
कूक को तरस रहा मैं,
मिठास पाने को तेरी,
अब जा, लौटना नहीं,
दुनिया तेरे लिए नहीं,
यहां कड़वाहड़ है,
दर्द के सिवा कुछ नहीं बाकि। 

-हरमिन्दर सिंह

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