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जिंदगी


जिंदगी पूछ रही ढेरों सवाल,
उत्तर उसे मिला नहीं,
चाह रही सुकून के पल,
मगर ऐसा हुआ नहीं।
उलझन का दायरा सिमटा कहां,
संकोची मन की बात,
नित-नये संकट आ रहे,
नहीं किसी का साथ।
अपना-पराया जान न पाये,
मतलब की दुनिया चारों ओर,
कश्ती डूब रही हौले-हौले,
न कहीं ठिकाना, न ठोर।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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