मौसम के मन में क्या है?


मौसम फिर दगा दे गया। उसे हमने मना नहीं किया कि यहां सुहाना मत हो। अपने मन की करने की जैसे उसने कसम खाई थी। लगता है इंसानी आदतें उसमें कहीं से समा गयी हैं। शायद यही कारण है आजकल मौसम की "सेहत खराब" है।

बादलों की उमड़घुमड़ से थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी थी। उनकी गर्जन से ऐसा लगा कि बरसात होगी। आसमान में अंधेरा छा गया था। मैं कमरे के भीतर ठीक से पढ़ नहीं पा रहा था, इसलिये रोशनी करनी पड़ी। हवा के झोंके आ रहे थे। मुझसे रहा न गया। कमरे से बाहर आ गया। आसमान में बादलों को देखकर मन प्रसन्न हुये बगैर नहीं रह सकता था। खुश था मैं, बहुत खुश। 


मैंने मां से कहा-"बारिश होने में समय नहीं। कोई सामान बाहर तो नहीं रखा।" तार पर सूख रहे कपड़ों को मैं स्वयं जाकर उतार लाया। मां सब देख रही थीं, वे बोलीं-"कई बार बादल दगा भी दे जाते हैं।"

मैं पक्की बात बताता फिर रहा था। पड़ोसी गोलू से मैं मिल नहीं सका वरना बेहतर और सटीक भविष्यवाणी वह करता। हालांकि मौसम से संबंधित यह उसका पहला प्रयास होता। पहले उसने मैच में भारत की फाइनल में जीत की सफल भविष्यवाणी की थी। ब्राजील कप के विजेता के बारे में किसी दिन उससे पूछूंगा।

छत पर जाकर मैंने कैमरे से तस्वीरें लेने की कोशिश की कि अंधेरे के कारण ऐसा हो न सका। आसमान में फ्लैश मारना सबसे बड़ा पागलपन हो सकता है। सिर्फ भगवान फ्लैश मार सकता है, कड़कड़ाती बिजली की मदद से।
बादल एकत्रित हुए जा रहे थे। तब यह भरोसा हो चुका थी कि हल्की-मामूली बरसात होनी नहीं, मूसलाधार होगी। लेकिन हमें क्या पता था मौसम रूख बदल देगा। घंटे भर तक आस जगाने के बाद बादल छंटने शुरू हो गये। यह इस तरह था जैसे पिज्जा किसी के द्वारा आपके घर आये और वह उसे खुद खाकर चला जाये, आप इंतजाम ही करते रहें।

मौसम के मन में जो भी लेकिन एक बात जरूर है कि उसका मन चंचल है। उसेे मन की करनी है। हम जानते हैं कि ऐसा करने से उसे कोई रोक नहीं सकता।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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