नदी और इंसान

"नदी का बहता पानी नीर है।" उसके वाक्य को मैंने ध्यान से सुना। वह इतना कहकर चला गया। मैंने देखा नदी का बहाव शांत था। वहां लहरों में उफान नहीं था। इस प्रकार कहा जा सकता था कि नदी अब मनमौजी नहीं रही।

जल की कल-कल ध्वनि को मैं सुन रहा था। वह व्यक्ति मेरे पास फिर आया। उसने कहा-"जल तो जीवन है।"

मैंने उसकी तरफ देखा तो वह मुस्काया।

मैंने पूछा-"नदी जीवन से जुड़ी है, फिर हम उससे दूरी क्यों बना रहे हैं?"

उसने उत्तर दिया-"हम भ्रम में हैं। नदी हमारे साथ जुड़ी है। वह स्वच्छ है। गंदगी तो हम फैला रहे हैं।"

मैं सोचने लगा कि इंसान कितना कुछ करता है। वह अपनी सोचता है, बिना किसी की परवाह किये। विपदा आने पर सबसे पहले घबराता भी है। लेकिन खुराफात करता रहता है। समझ नहीं आता कि यह उसकी प्रवृत्ति है या ऐसा वह जानबूझकर करता है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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