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पेशावर डायरीज़ : 1

नया साल आने में ज्यादा देर नहीं बची। मैं खुश हो रहा हूं। मेरी बहन अमीना को मुझसे कहीं ज्यादा खुशी है। अब्बा ने उसे नये कपड़े जो खरीदे हैं। वह फुदक कर फिर मेरे पास आ बैठी है। मैं एक उपन्यास पढ़ रहा हूं जो एक विदेशी ने लिखा है। उसका अनुवाद जर्मन से अंग्रेजी में किया गया है। अब्बा अंग्रेजी को विलायती भाषा कहते हैं। वे पढ़े-लिखे नहीं हैं, मगर उन्हें उर्दू जुबान से बेहद प्यार है। टूटी-फूटी अरबी बोलने में अब्बा को दिक्कत नहीं। मेरा ख्याल है कि उन्हें फारसी भी सीख लेनी चाहिये। उनके फारसी सीखने की बात मुझे इसलिये याद आयी क्योंकि जब वे अरबी सीख रहे थे तो एक मजेदार किस्सा घटा जिसके बाद वे कभी अरबी पूरी नहीं सीख पाये।

मैं आपको अब्बा के किस्से से पहले अपना परिचय करा दूं।

मेरा नाम अजमल है। मैं पेशावर के एक छोटे से कस्बे में रहता हूं। तंग गलियां और दिनभर चलते-फिरते लोग। मेन सड़क से कुछ दूर मौहम्मद आजम का मकान है। मैं वहीं रहता हूं। कस्बे में दोमंजिला मकान किसी का नहीं है सिवाय हमारे। अब्बा कहते हैं उन्होंने काबुल से यहां बसकर खूब पैसा, शोहरत कमाया है। 

मेरे अब्बा को लोग मौहम्मद साहब कहकर भी पुकारते हैं। हम पहले काबुल में रहते थे। वहां ऐसा कुछ हुआ जिसकी वजह से हमें यहां आना पड़ा। मेरी याद धुंधली है। तब मैं बहुत छोटा था। अब्बा ने सिर्फ इतना बताया है कि मेरी अम्मी की मौत काबुल में हो गयी थी।

मैं आठवी में पढ़ रहा हूं। अमीना और मैं हमउम्र हैं। वह मेरे सगी बहन नहीं, बल्कि उसे मेरे अब्बा ने पाला है। अमीना की कहानी भी दिलचस्प है उसे बाद में बताऊंगा।

हमारे एक पड़ोसी के लड़के ने सुबह से शोर मचा रखा है कि वह रात के बारह बजते ही अपनी छत पर एक अनार जलायेगा। उसके रिश्तेदार इस्लामाबाद से कल ही आये हैं। वे कुछ आतिशबाजी का सामान लाये हैं। उनका एक बेटा अरब में किसी बड़ी कंपनी में काम करता है।

अनार के कारण नदीम का हाथ जल गया था। किसी वजह से अनार फट गया। खुदा की खैर थी कि नदीम की आंख बच गयी। उसकी छत और हमारी छत मिली हुई है। कभी-कभी शाम को हम दोनों साथ में छत पर खेलते भी हैं। तब अमीना अपनी सहेलियों के संग होती है। उसकी बिना सिर-पैर की बातों से मुझे चैन मिल जाता है।

अमीना बार-बार उपन्यास को घूरने की कोशिश करती है। समझ नहीं आ रहा कि वह खुद पढ़ना चाह रही है या मुझसे पढ़ने को कह रही है। वह बोलती क्यों नहीं। वह गूंगी भी नहीं है।

"तुम मुझे तंग मत करो।" मैंने इतना कहा।

वह थोड़ा पीछे हटी। नाक को तिरछा किया। भौहों को सिकोड़ा। पुतलियों को गोल-गोल घुमाया। वह कुछ नहीं बोली।

मेरा ध्यान बंट रहा है। वह सो क्यों नहीं रही। इस समय तक वह अपने बिस्तर में होती थी।
अब्बा रहमान के साथ कितने समय से गप्पे हांक रहे हैं। शाम के बाद वे फिक्र को भुला देते हैं। उनका पुराना दोस्त रहमान जिसकी कोई औलाद नहीं। उसकी बीबी उसे तंगहाली की वजह से छोड़ गयी। वह भी अब्बा के संग बैठकर अपना समय काट लेता है।

कहीं से आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाजें आ रही हैं। किसी ने उन्हें पत्थर मारा होगा क्योंकि वे चिल्लाये। वे जोर से चीखे भी। हमारे कस्बे में लोग कुत्तों को किसी फालतू जानवर से कम नहीं समझते। नाजिम ने उस दिन एक कुत्ते की टांग ही तोड़ दी होती यदि मैं मौके पर न पहुंचता। शायद वह आखिरी दांव होता जब मैंने उसके हाथ से डंडा झटक दिया। बेचारा कुत्ता लड़खड़ाता और चीखता चला गया। नाजिम के चेहरे पर लाली छायी थी। उसके बाल बिखर गये थे। आंखों में अजीब गंभीरता और शरारत भरी हुई थी।

उपन्यास पढ़ते हुये मुझे आंखों में भारीपन महसूस होने लगा है। अमीना भी कंबल ओढ़कर ऊंघती दिखाई दे रही है। कल उसकी और मेरी छुट्टी है। हम स्कूल नहीं जा रहे।

देखते ही देखते वह रजाई तान चुकी। कुछ देर बाद वह मानो नींद के आगोश में चली जायेगी। नये साल की आखिरी रात के आखिरी मिनटों का मैं कभी गवाह नहीं बन सका। बहुत कोशिश की कि बारह बजते हुये देखूं, लेकिन नहीं हो सका ऐसा। इस बार उम्मीद थी मगर उपन्यास पढ़ते-पढ़ते नींद आ रही है।

मेरी उम्र के बच्चे स्कूल की किताबों से समय नहीं निकाल पाते, मगर मैं उपन्यास भी पढ़ता हूं। मेरी क्लास के दूसरे बच्चे इस बारे में सोच भी नहीं सकते। समय को वे चुनौती नहीं देना सीख पाये या वक्त निकालने की हिम्मत उनमें नहीं।

मेरे अब्बा को लगता है कि किताबें इंसान को समझदार नहीं बना सकतीं। इंसान खुद के बल से समझदार बनता है। इसके लिये जस्बा चाहिये। इसके लिये जोश की जरूरत है जो सब्र से हासिल हो सकता है।

रहमान जा चुका था। रात के नौ बजने पर वह दूसरों के घर वक्त नहीं गुजार सकता और शाम होते ही वह घर से निकल कर दूसरों के साथ वक्त बिताये बगैर रह नहीं सकता। अब्बा ने उसे एक बार अपना सगा भाई कहा था। तब बाबू कसाई खूब हंसा था। उस दिन ईद थी। रहमान बाबू से गले नहीं मिला था। उसने मुझे पांच का नोट जरूर दिया था जिसे लेकर मैं तुरंत चांद की हवेली गया। 
तिकोनी मिठाई हर दिल अजीज़ है। दो गली छोड़ कर दो दरवाजे वाली दुकान का नाम हवेली है। दुकान पुरानी हवेली मेें है जिस वजह से चांद की दुकान उसी नाम से मशहूर हो गयी।

मिठाई लेकर जब मैं घर लौटा तो रहमान बाबू के पास बैठा था। सामने मेज सिवैयां और मेवों से सजी थी। अमीना मुझे देखते ही दौड़ी चली आयी। उसने झट से दो मिठाई के टुकड़े मुंह में छिपा लिये। उसे मेरी तरह चांद की तिकोनी मिठाई बेहद पसंद है।

अमीना को नींद आ गयी। अब्बा रजाई में सिकुड़ गये। उनके खर्राटे आने लगे। मैं अभी जाग रहा हूं, लेकिन मेरी आंखों में भारीपन कम नहीं हो रहा। लगता है नींद आने वाली है। घड़ी देखकर कहा जा सकता है कि नया साल आने में वक्त थोड़ा बचा है।

मुझे फिर से कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगी हैं। किसी के डंडा खड़काने की आवाज भी सुनाई दी। कहीं नाजिम तो नहीं?

सुबह कोहरा होगा या नहीं, कह नहीं सकता। कितना तापमान होगा बता नहीं सकता। अंदाज है कि सर्दी कम नहीं होगी। साल का पहला दिन खूब ठंडा भी हो सकता है। मुझे यहां की एक बात बहुत अखरती है कि यहां बर्फ नहीं गिरती। खुदा करे यहां भी बर्फबारी हो। तब मैं और नाजिम खूब खेलें। जीभर खेलें। काश ऐसा हो पाता।
-क्रमश:

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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