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पेशावर डायरीज़ : 2

जनवरी की पहली सुबह कम ठंड थी। बादलों के कतरे घर के ऊपर से गुजर रहे थे। सुबह की अजान के वक्त मेरी आंख खुली। मैं रोज की तरह अब्बा के कमरे में गया। उन्हें जगाया। वे आंखें मूंदे कुछ देर तक खिड़की की तरफ ताकते रहे। कांच का बना शीशा आरपार को साफ दिखा देता है लेकिन उस समय यह मुमकिन नहीं था। बाहर अंधेरा था।

उन्होंने खामोशी से मेरी ओर भी देखा। उनकी आंखों की सूजन यह बता रही थी कि वे खूब सोये थे। दिसंबर की कई रातों से उन्हें अजीब सपने आ रहे हैं। वे चैन से सो नहीं पाये थे। एक-दो बार अब्बा ने मुझे और अमीना को चौंकाया भी था। मैं भी रात में उठा। अमीना गहरी नींद में सोती है, वह भी जागी। इसका मतलब यह था कि जरूर अब्बा की चीख बहुत ऊंची होगी।

उन्होंने रजाई को अपने शरीर के आधे हिस्से तक खींचा। गंभीरता के साथ वे फिर से खिड़की की ओर गर्दन घुमाकर ताकने लगे। ऐसा लगता था जैसे खिड़की में उन्हें किसी जान पहचान वाले की शक्ल नजर आ रही थी। वह शख्स ज्यादा करीबी मालूम पड़ता था। अब्बा की निगाह में उतार-चढ़ाव नहीं था। उन्होंने जमुहाई ली। रजाई को धीरे-धीरे खुद से दूर किया। उनकी इस हरकत से साफ हो गया था कि उनका ध्यान टूट गया था।

जनवरी की पहली तारीख है। साल का पहला दिन। साल की शुरूआत यहीं से हर बार होती है और खत्म भी एक दिन पहले।

अमीना ने कल ही दीवार पर नया कलेंडर टांगा था। वह पलंग पर खड़ी होकर अपने काम को अंजाम देती रही। काम केवल चंद मिनटों का था। कलेंडर टांगना था जिसे कोई काम नहीं कहा जा सकता। कील पहले से दीवार को चीरकर गढी थी। वह दीवार का साथ उसके बनने से निभा रही है। एक-एक ईंट आज उसे जानती है।

मुझे आश्चर्य हुआ कि अमीना कलेंडर को टांगने में समय खर्च कर रही थी। वह बार-बार उसे सही 'पोजीशन' में लाने की सोचती। जबकि मेरे हिसाब से उसे कलेंडर को छेड़ने की आवश्यकता नहीं थी।
फिर अमीना ने पहली तारीख पर गोला लगा दिया। वह हर साल 31 तारीख को नये साल की पहली तारीख को स्केच से गोला बनाकर यह साबित करती है कि साल का चक्र शुरू हो चुका है। तारीखें बीतेंगी, दिन बदलेंगे और नये वक्त के लिये दुआ की जायेगी।

अब्बा नये साल में उसे नये कपड़े दे चुके थे जिन्हें पहनकर वह फूली नहीं समाई थी। मैं साधारण कपड़ों में रहा। अब्बा ने कहा भी, लेकिन मैंने इंकार कर दिया था। लाल जर्सी, नीला कमीज, बादामी पैंट जिसकी धारियां गिनती में चार हैं, लेकिन अमीना उनकी भी गिनती करती है। मैं बेल्ट नहीं लगाता। स्कूल जरूर मजबूरी में जाना पड़ता है। वहां ड्रेस होती है। कमीज को दाबकर चलना भी अजीब लगता है। जाड़ों के समय जर्सी होती है या मेरा काला कोट। तब कमीज पैंट से बाहर नहीं आती।

रेडियो पर खबरें चल रही थीं। अब्बा के कान उधर ही थे और आंखें जमीन पर टिकी थीं। पेशावर में आर्मी स्कूल के ऊपर हुए हमले की खबरें अभी सुर्खियां बनी हुई हैं। कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। कुछ पर शक है। कुछ को भविष्य में पूछताछ के लिये बुलाया जा सकता है। पुलिस अपना काम कर रही है, सेना अपना और सरकारी नेताओं के बयान भी रोज सुनने को मिल रहे हैं।

उस दिन मैं छत पर खेल रहा था। अब्बा को रहमान ने सबसे पहले सूचना दी। रहमान को बाबू कसाई ने बताया होगा। वह पूरे पेशावर शहर की खबर रखता है। दोपहर बाद उसकी दुकान पर रोज से चौगुनी भीड़ थी। चांद की हवेली पर नाम चार को कोई आया होगा।

पेशावर उस दिन ठहर गया था। हर किसी के चेहरे पर शंका की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। सायरन का शोर देर रात तक सुना जाता रहा। मैं हमले की कल्पना कर कांप जाता था। अब ऐसा नहीं है।

अब्बा ने रहमान से कहा-"या अल्लाह सब्र कर।" इतना कहकर वे रूके। एक बार आसमान के नीलेपन को निहारा जिसमें बादल एक किनारे पर छिटके हुए थे। फिर आंखों को सिकोड़कर भरे मन से बोले-"मासूमों की रूहों को सुकून बख्श।"

उस दिन इंसानियत रोई थी। जी भर कर रोया था हर वह शख्स जो इंसान था। उन लोगों के लिये वक्त भारी था, लंबा था और बेशुमार दर्द से लबरेज़।

कैसे दहशतगर्द हमारे मुल्क को सिसकने पर मजबूर कर रहे हैं? कैसे हम उनका निशाना बन रहे हैं? ऐसे ढेरों सवालों का कंकाल आज हर किसी के बिस्तर पर पड़ा है या उनके दिमागों में मलबे का ढेर बन गया है।

मैंने देखा उस दिन नाजिम शांत था। उसने किसी कुत्ते को तंग नहीं किया। उस रात किसी ने सीटी नहीं मारी। कोई खुली गली के तिराहे पर नहीं चिल्लाया। रहमान गप्पें हांकने के बजाय देर रात तक अब्बा से सिर्फ स्कूल का जिक्र करता रहा।

शाम को मैंने उपन्यास पढ़ा। अमीना किताबों में मशगूल थी। मेज पर फैली किताबें और बेतरतीब ढंग से रखी कापियां यह दर्शा रहीं थीं कि उसका पढ़ाई-लिखाई का तरीका अभी पहले जैसा है। बालों पर रूखापन था। वह सप्ताह में इतवार को सिर में तेल लगाती है।

मैंने खिड़की से देखा कि कहीं-कहीं रोशनी जगमगा रही है। कोहरे की चादर उन्हें धुंधली कर रही है। जहां तक मैं देख सकता था देखा। हवा का कोई अनजान झोंका नहीं चला। मौसम सर्द, रूखा और शांत था।
क्रमश:

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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