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उम्र : एक कविता

old age umar


उम्र केवल गिनती नहीं होती,
वह तो दिखती है चेहरे की रेखाओं में,
सुनने के उपकरणों में,
मोटे-मोटे चश्मों में,
झाँकतीं मिचमिचाती बेचैन,
बेज़ार आँखों में
कुपोषित कमजोर देह में,
उठने, बैठने, चलने की लाचारी में,
हर बात में इज़ाज़त माँगती,
मज़बूरी में,
असाध्य बीमारी में,
खाँसी से कमजोर छाती में,
निशदिन मौत माँगती,
भगवान से मरने की
प्रार्थना में.

यदि यह सब बातें
उम्र का परिचय देती हैं,
तो इसे ही उम्रदराज़ होना भी कहते हैं,
और मजबूरी में जिंदगी जीना भी इसे ही कहते हैं.

-अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

6 comments:

  1. धन्यवाद हरमिंदर जी मेरी कविता "उम्र" को वृद्धग्राम में स्थान देने के लिए , उम्र तो बढ़नी ही है और हर कोई
    को उम्र दराज भी होना है अतः यदि हर कोई बुजुर्गों में अपने आने वाले कल की छवि देखे और जैसी जिन्दगी हम अपने लिए सोंचेंगे उस उम्र में वोही या ....लगभग वोही अपने बुजुर्गों को दें तो सारी समस्या ही हल हो जाएगी बुजुर्ग केवल प्यार.. आदर.. देखभाल चाहतें हैं और बदले में अपना स्नेह आशीर्वाद और अनुभव दे सकतें हैं जो बड़े काम की चीज होते हैं

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    1. अखिलेश जी,
      उम्र पर लिखी आपकी एक-एक पंक्ति अनेक बार पढ़ने का मन करता है. अपने जीवन के अनगिनत पहलुओं को करीब से देखा है.

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  2. बढ़ती उम्र अपने आप में ही एक तूफान समेटे हुए होती है , किस दिल पर क्या गुजरी , उसे शब्द दे देना ....
    हर बात में इज़ाज़त माँगती,मज़बूरी में,
    जैसे सारी व्यथा कह दी गई हो।

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    1. शारदा जी,
      उम्र बढ़ती इंसान जिंदगी के उन पलों को जी रहा होता है, जो उसके लिए कठिन जरुर हो सकते हैं, लेकिन वक्त का वही दौर उसके जीवन की कहानी भी लिख रहा होता है.
      धन्यवाद.

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  3. बहुत खूब ... उम्र जीवन गाथा समेटे होती है ... एक इतिहास होता है इन लकीरों में ...

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    1. दिगंबर जी,
      उम्र जीवन की गाथा समेटे है, अपने सही कहा है. लकीरों में जो इतिहास छिपा है वह जाने कितने रहस्य अपने अन्दर भरे हुए है.
      आभार.

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