कृषक -कविता

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जोत रहा भूमि की काया तपा हुआ वसुधा का कण-कण।
अम्बर बना हुआ है मानो अग्नि के लावे का बरतन।।

झरने की भांति बहता है कृषक तन से तेज पसीना।
डटा हुआ है कृषि कर्म में फिर भी अपना ताने सीना।।

जब बादल में बिजली चमके, या पड़ रहा शीत दुखदायी।
तू अपने कर लिए फावड़ा धरती की कर रहा खुदायी।।

आंधी वर्षा कुछ भी आये, तुझे कोई परवाह नहीं है।
कर्मशील बन मेहनत करना, कोई भी चाह नहीं है।।

-जी.एस. चाहल.

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