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हंसता और खिलखिलाता बुढ़ापा

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उम्रदराज दोस्त खूब ठहाका लगाते हैं। उनकी हंसी भी जवानों की तरह ही सुकून पहुंचाती है। वे भी उस समय खुद को भूल जाते हैं।

बुढ़ापा हालांकि उतना हंसता नहीं, उतना मुस्कराता नहीं। वह सोचता अधिक है। वह खोया भी रहता हैं कहीं। उसे हम उतना गुमसुम नहीं कह सकते। वैसे भी जीवन के अध्याय निराले होते हैं और उनमें भिन्नता होती है। पहले से दूसरा अलग ही होगा। उसी तरह बाकि भी अपनी कहानी बयान करेंगे।

मैंने बहुत बूढ़ों को बीते दिनों के मजेदार किस्से सुनाकर हंसते हुए देखा है। उनकी खुशी को महसूस किया है। उन पलों की बारीकियों को समझा है। वह अद्भुत है।

यदि दो बूढ़े मित्र मिल जायें या उससे अधिक और दौर शुरु हो जाये हंसने-हंसाने का तो क्या कहने।

कई अरसे पहले देहरादून में मुझे एक वृद्ध मिले जो अकेले रहते थे। परिवार विदेश में था। साल में एक या दो बार वे उनसे मिल पाते। मगर उन्हें उतनी बोरियत नहीं होती थी क्योंकि पड़ोस के दूसरे बूढ़े भी उनकी तरह ही मिलनसार और जिंदादिल थे। शाम को वे एक साथ बैठते और चर्चायें मजेदार रुप ले लेतीं। नयी-पुरानी बातों का सिलसिला जब चल निकलता तो थमने का नाम ही नहीं लेता।

मैं उन उम्रदराजों के साथ करीब कुछ मिनट ही बैठा होंगा कि ऐसा लगा कि जैसे हम सदियों से जान पहचान रखते हैं।

बुढ़ापा जिंददिल हो सकता है। बुढ़ापे में हमउम्र मित्र हों तो मौसम उदास नहीं लगता। बीते दिन तो मानों रौनक ला देते हैं। नये किस्से महफिल को सजा देते हैं।

हां, वह खिलखिलाते चेहरे, मगर झुर्रियों में लिपटे हुए ही सही, जिंदगी की नई इबारत लिखने को बेताब है। 

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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