किताबें और शब्दों की गहराई

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किताबों को खरीदने की सोच रहा हूं. बहुत समय से कोई उपन्यास नहीं पढ़ा. किताबें पढ़ने के बाद आप खुलापन महसूस कर सकते हैं. मैं नहीं जानता कि हर किसी के साथ ऐसा होता होगा, लेकिन मेरे साथ ऐसा ही है.

किताबों की एक नई शेल्फ बनवाने की मैंने सोच रखी है. उसका डिजाइन मेरे दिमाग में घूम रहा है. किनारों को घुमावदार बनाने की मैंने बहुत पहले सोची थी.

परदादा की वह लाइब्रेरी याद आ गयी जिसमें उन्होंने सदियों पहले तक अच्छा खासा साहित्य संजोया हुआ था. हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू तो वहां आम थी, लेकिन हैरानी इसको लेकर थी वहां रुसी किताबों की संख्या भी काफी थी. एक कमरे में अलमारियों में सलीखे से रखी किताबों को मैं बचपन में देखता, थोड़ा-बहुत पढ़ता, फिर वहीं सजा देता. उनके गुजर जाने के बाद मुझे किताबों का मतलब पता चला. तबतक देर हो चुकी थी. किसी के पास इतना समय नहीं था कि किताबों की कद्र कर पाता.

मेरा लगाव किताबों के लिए बढ़ता जा रहा है. खुशी मिलती है जब कुछ अच्छा पढ़ता हूं. खुशी मिलती है जब किसी को पढ़कर सुनाता हूं और वह मुस्कराता है. सच में वे भाव होते ही इतने गहरे हैं कि हम खुद से भी कुछ पलों के लिए दूर हो जाते हैं.

शब्दों की गहराई को नापा नहीं जा सकता. गोता लगाना हर किसी के लिए चाव का विषय नहीं हो सकता है. लेकिन मतलब वे ही समझ पाते हैं जो गोता लगाते हैं.

जिंदगी का उसूल है कि चीजों को महसूस करो. ज्यादा देर नहीं लगेगी कि आप उनमें खोने लगेंगे और वही स्वाद जीवन का मतलब भी आपको समझा जायेगा. यह चुटकी बजने की तरह होगा -बस हो गया.

किताबों के पन्नों के किनारे पीले पड़ने से पहले वक्त जाने कितने सफर हमें करा देता है. खैर, असल बात यह है कि शब्द अपनी बनावट नहीं खोते और हम उस हिसाब से खुद को ढालते भी रहते हैं.

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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4 comments:

  1. बिलकुल सही कहा आपने। पूर्णतः सहमत हूँ आपके विचारों से।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - राजेंद्र यादव जी की पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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