हम प्यार क्यों करते हैं?

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प्रेम भावों का समुद्र है, गोते लगाते जाओ, डूबते जाओ; शायद ही कभी पार लग पाओ.

‘‘मुझे आज तक समझ नहीं आया कि हम प्यार क्यों करते हैं? इतना जरुर जानते हैं कि कोई रिश्ता ऐसा है जो हमें दिख नहीं पाता और हम प्यार करते हैं। कई लोग ऐसे होते हैं जिनके साथ हम अलग-अलग तरह से प्रेम करते हैं। माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त, आदि प्यार के बंधन में जकड़े हैं और हम उनके। यह प्यार ही तो है जो हमें अपनों से जोड़े रहता है।

प्यार एक अनजाना, न दिखने वाला एहसास है जो हमें बांधे रखता है।’’ इतना कहकर बूढ़ी काकी चुप हो गयी।

मैंने कहा -‘वाकई यह अजीब होता है, कि हम प्यार करते हैं और फिर उसका एहसास करते हैं। खुशी मिलती है आंतरिक तौर से। कई बार दर्द का भी एहसास होता है। खुशी और गम दोनों से ही प्रेम आगे बढ़ता है.’

बूढ़ी काकी बोली -‘प्यार दिखता नहीं है। वह तो महसूस किया जाता है। मैंने उसे महसूस किया है। ऐसा लगता है मानो हम उड़ान भर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे हमने खुद को भुला दिया है। अजीब स्थिति है ना, हां बहुत हैरानी भरे पल होते हैं वे जब आप प्रेम की धुन में स्वयं को नाचता हुआ पाते हैं। मैं अच्छी तरह जानती हूं और दावे के साथ कहती हूं कि जिंदगी में बिना प्रेम के कुछ है ही नहीं। बहती हुई नदियां, बहती हुई हवा, बहती हुए विचार, भाव, हर किसी में प्रेम का बहाव है। तभी हम उन्हें देखकर प्रभावित हो सकते हैं। यह प्रेम ही है जो हमें रिश्तों में जोड़े रखता है। वरना हम कब के खुद से दूर हो गये होते।’

इसपर मैंने कहा -’मैंने किसी से प्यार नहीं किया। मगर मुझे ऐसा कई बार लगा कि मैं प्यार करने लगा हूं। जब सब बिखर गया, तब मुझे एहसास हुआ कि अरे! वह तो प्रेम था। मैं फिर क्यों अनजान रहा? मुझे नहीं पता, लेकिन मैं इतना जानता हूं कि एहसास बहुत अच्छा था। एक अजीब तरह का एहसास। मुझे इसका अध्ययन करने का समय ही नहीं मिला काकी। मैं अपने कामों में ही उलझा रहा। मैं प्यार करना चाहता था, मगर कर न सका। जब सोची तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लेकिन मैंने खुद को समझा लिया और मना भी लिया कि प्यार उन से किया जा सकता है जो हमेशा आपके पास रहें। मेरा परिवार है, कुछ ख़ास लोग हैं जिन्हें मैं चाहता हूं। पर मुझे नहीं लगता कि हमें कहीं दूसरी जगह प्यार तलाशने की आवश्यकता है क्योंकि इतना कुछ तो हमारे पास है।’

काकी बोली -‘तुम ठीक कहते हो। मगर बेटा प्यार का रहस्य बड़ा ही गहरा है। इसे शायद भगवान भी समझकर और समझने की कोशिश करे। यह तो कहीं भी, किसी को भी, किसे से भी हो सकता है। हां, हमारा परिवार हमें चाहता है, हम उन्हें और कुछ ख़ास लोग भी हमें चाहते हैं। इस तरह हम एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। भाव बहते रहते हैं, हम प्यार करते रहते हैं।’

‘तुम्हें पता है हम प्यार जाने-अनजाने में भी कर लेते हैं। वह प्यार कई बार इतना गहरा हो जाता है कि हम समझ नहीं पाते कि अब क्या करें? पशोपेश आड़े आता है और इंसान को बिखरने पर मजबूर भी कर देता है। तब अपने ही होते हैं हमें संभालने के लिए। यह विषय इतना व्यापक है कि मैं खुद उलझन में हूं कि कहां से शुरु करुं। खैर, तुमने कभी किसी अनजाने से प्यार किया हो तो इसका मतलब शायद समझ जाओ।’

मैंने कहा -‘मुझे नहीं लगता कि मैं कभी प्रेम-पाश में पड़ा हूं, मगर ऐसा कई बार लगता भी है। अधिकतर बार हम प्रेम में तब पड़ जाते हैं जैसा मैंने सुना है, जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो हमें दूसरों से अलग लगता है। मुझे ऐसे कई लोग मिले। मुझे नहीं लगता कि मैंने उनसे प्रेम किया, पर हां, इतना जरुर हुआ कि मैं उनसे हद से अधिक लगाव कर बैठा था। आजतक उनसे दूरी का दर्द मुझे सालता है। इसे प्रेम कहा जाये या कुछ ओर, मैं नहीं जानता।’

‘आकर्षण हुआ जरुर था, लेकिन वह अधिक समय तक नहीं रहा। बाद में शायद मैं उतना घुलमिल नहीं सका, या मैं घबरा गया। मुझे शायद तब हर चीज़ को उतनी बारीकी से देखने की समझ नहीं थी। मैं एक तरह से ऐसे माहौल में स्वयं को पा रहा था जब मुझे बहुत कुछ पता नहीं था। वह अनजान होने की स्थिति कही जा सकती है। लेकिन सही मायने में मैं उतना अनजान भी नहीं था।’

काकी ने मुझे गौर से देखा, फिर बोली -‘ओह! तो तुमने भी प्यार किया है। शायद वह प्यार की तरह था या उसे तुम सच में प्रेम कह सकते हो। आकर्षण हुआ और तुमने उसे सबकुछ मान लिया। ऐसा होता है, क्योंकि शुरुआत अक्सर ऐसे ही होती है। हृदय में उथलपुथल होती है और इंसान में कशमकश। कई बार एक झलक में बहुत कुछ हो जाता है, कई बार वर्षों लग जाते हैं। वैसे प्रेम का भाव काफी मजबूत होता है, यदि उसे ढंग से निभाया जाये।’

‘प्रेम कहानियां अकसर खूबसूरत होती हैं। कई बार उनमें दो दिलों का मिलन नहीं हो पता तो, हृदय को ठेस से महसूस होती है। प्रेम भावों का समुद्र है, गोते लगाते जाओ, डूबते जाओ; शायद ही कभी पार लग पाओ। पर सच्चा प्यार और काबिल प्यार किनारे लगता ही है। दिखावटी तो संसार है, प्यार नहीं। भ्रम भी यहीं मंडराता है।‘

’मैं खुद से जूझ रही हूं लेकिन खुद से प्रेम भी कर रही हूं। जीवन से भी तो हम प्रेम कर सकते हैं। बुढ़ापे से भी प्रेम किया जा सकता है। मुझे मेरी उम्र से प्यार हो गया है। तुम यह भी कह सकते हो कि मुझे बुढ़ापे से प्रेम हो गया है। यह उम्र के लिहाज़ से बुरा बिल्कुल नहीं है। बात सिर्फ नजरिये की है। कोई किसी से भी प्यार कर सकता है। प्यार का मतलब भाव से है। जब भाव से भाव का मिलन होता है तो एक और भाव उत्पन्न होता है। वह है प्यार का भाव जिसका अदृश्य होना उसकी खासियत है। वैसे भाव दिखते ही नहीं, महसूस किये जाते हैं।’ (1004 शब्द)

-हरमिंदर सिंह.

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