एक कैदी की डायरी -5



मैं खुद को कठोर हृदय मानता हूं। रिश्तों से दूर जाने की कोशिश कर रहा था, पर ऐसा हो न सका। क्यों ऐसा नहीं हुआ, यह मैं भी नहीं जानता। इतना जरुर जान गया कि रिश्ते इंसान को कमजोर नहीं दृढ़ बनाते हैं। एक आशा होती है जो जीवन में हताशा को कम कर देती है। उम्मीद कायम है तो कुछ कठिन नहीं। मैं हार कर जीतने की कोशिश में जुटा हूं। अपने जस्बातों को किनारे नहीं कर सकता। मुझे भरोसा है कि एक दिन मैं अपने परिवार से जरुर मिलूंगा।

मेरे साथी कैदी अब्दुल ने मुझे किस्मतवाला कहा था। उसके अनुसार वह तो दुनिया में एकदम अकेला है क्योंकि उसकी दुनिया कब की तबाह हो चुकी। अब्दुल का परिवार दंगों की आग में झुलस गया। पूरा घर फूंक दिया गया। जब वह लौटा तो जले खंडहरों और राख के सिवा कुछ न था। अब्दुल एक पल के लिए ठिठक गया था। आंखों के आगे अंधेरा उभर आया था। चेहरा लाल हो चला था। मुट्टिठयां भींच कर जमीन पर दे मारीं और कहा,‘या अल्लाह, क्या किया?’ दुख इतना था कि उससे काफी देर उठा न गया। वह गश खाकर वहीं गिर पड़ा। यह दर्द अपनों के बिछुड़ने का था, उनके सदा के लिए दूर जाने का था। मौत की हंसी, जिंदगी का मातम होती है।

अब्दुल ने खुद को संभाला, टूटने से बचाया। लेकिन बुरा वक्त जब किसी का पीछा करता है तो हाथ धोकर पीछे पड़ता है। कुछ लोगों ने उसे भी जिंदा जलाने की कोशिश की। उसने मुझे जले के निशान दिखाये। वह तब किसी तरह बच निकला, लेकिन दंगे फिर भड़के तो उसे हत्या के जुर्म में मेरी कोठरी में डाल दिया गया। उससे मैंने काफी कुछ सीखा। जिंदगी में टूटी चीजों को जोड़ना सीखा। हताशा से लड़ता एक आम इंसान बिल्कुल बेबस दिखाई देता है। अब्दुल के लिए भी काले दिन आये, लेकिन उसने बताया कि जूझना इंसान को पड़ता है ताकि और मजबूती आ सके। वह डिगा नहीं, सामना करता रहा दुखों का लेकिन दिल के गहरे जख्मों को मरहम लगाने की कोशिश उसके हौंसले ने की। इंसान हैं तो दृढ़ होना भी सीखना पड़ता है। वही सब तो कर रहा था अब्दुल।

मगर शायद मैं अब्दुल जितना भीतर से मजबूत नहीं। कमजोर हो गया हूं मैं, थक गया हूं। सोच-विचार कर हृदय व्यथित हो उठता है। व्यथा हौंसला पस्त करने के औजार की तरह काम करती है। मुझमें शक्ति का संचार नहीं हो रहा। गिरे पड़े सूखे पत्ते की तरह फड़फड़ाहट का अहसास हो रहा है। यह अशांति का, उथलपुथल का कारण है। संभलने की कोशिश उतनी कारगर साबित नहीं हो रही।

-harminder singh

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