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एक कैदी की डायरी - 52

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लाजो पर मुझे गुस्सा भी आ गया था। वैसे मैंने उससे एक बार कहा था,‘तुमपर मैं गुस्सा कभी कर नहीं सकता। तुम चाहो तो ऐसा कर सकती हो।’

लाजो को मैंने कहानियों की एक किताब दी। उसमें एक कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी थी। मैं चाहता था कि वह उसे जरुर पढ़े। किताब हाथ में थामते समय उसने हामी भरी थी। मैं काफी खुश हुआ था। मुझे ऐसे अवसर पर प्रसन्नता होती है। मैं अपनी प्रसन्नता को छिपाता नहीं, बयान कर देता हूं।

लाजो के सामने मेरी स्थिति अजीब हो जाती थी। मैं उसकी आंखों में झांक नहीं सकता था, घबरा जाता था।

कुछ दिन बाद उसने मुझे किताब वापस कर दी। मैंने पूछा,‘तुमने क्या पढ़ा?’

वह बोली,‘कुछ नहीं।’

यह सुन मैं हक्का-बक्का रह गया। मुझे यकीन नहीं हुआ। जैसा मैं सोच रहा था, वैसा हुआ नहीं। ऐसा कई बार होता है जब सोच को धक्का लगता है और हम अचंभित रह जाते हैं। हालांकि यह अचंभा कुछ पल का होता है, लेकिन हृदय पर असर जरुर डालता है। मैं नाराज था।

मुझे भरोसा था और पूरा भरोसा कि वह मेरी तरह के विचार रखती है। मैं मानता हूं कि वह मेरी तरह काफी सोचती है। उसने मुझसे कहा भी था,‘दुनिया में अभी तक मुझे दो लोग ही मिले जिनके विचार मुझसे मेल खाते हैं। एक अन्नपूर्णा थी जो मेरी पक्की सहेली थी।’ थोड़े विराम बाद उसने धीरे से कहा,‘......और एक तुम।’

मुझे एहसास हुआ कि जैसे मेरे हृदय पर किसी ने हल्की दस्तक दी हो। हां, वह दस्तक ही थी। अब शायद दरवाजा धीरे-धीरे खुल रहा है। मुझे लाजो पर सदा भरोसा रहा है। समय ने भरोसे को पक्का किया है। लेकिन मुझे लाजो पर गुस्सा आ गया। मैंने उसके सामने उसे प्रकट नहीं किया क्योंकि मैंने कभी चाहा नहीं कि उसका दिल दुखे।

किताब न पढ़ने का कारण मैंने हिम्मत कर पूछा। पहले मैं ऐसा करने वाला नहीं था।

लाजो ने कहा,‘भूल गयी थी।’

वह कारण मामूली था। मुझे लगता है, हमारे पास कारण बहुत होते हैं। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना हम बखूबी जानते हैं जबकि बड़ी बातों को चाहिए बड़ा कारण। जीवन में विकल्प हमेशा रहते हैं, उसी तरह हर बात का कारण होता है।

अन्नपूर्णा के बारे में लाजो ने ज्यादा नहीं बताया। लछमी को तो मैं जानता था। लाजो ने लछमी के बाद अन्नपूर्णा को अपनी सखा बनाया था। लेकिन अन्नपूर्णा ने उस जगह को भर दिया था जिसे लछमी रिक्त छोड़ गयी थी। कभी-कभी जिंदगी अकेली पड़ जाती है, मगर लाजो के साथ भी ऐसा हुआ, पर उसका एक हाथ मैंने थामा जबकि दूसरा अन्नपूर्णा ने। तब मैं लाजो के समीप नहीं था, लेकिन उसके साथ था। वह मुझे याद करती थी। जब मैं लगभग एक साल बाद गांव लौटा तो लाजो मुझे देखकर फूली नहीं समायी। खुशी से उसकी आंखें छलक आयी थीं तब। उस समय अन्नपूर्णा उससे दूर जा चुकी थी।

जारी है...

-हरमिन्दर सिंह चाहल.
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