Header Ads

खत्म जहां किनारा है

दीवानों की बस्ती में,
आज नया सवेरा है,
कल तक थीं बस यादें अपनी,
आज सुखों का डेरा है,

-------------------------------
-------------------------------
-------------------------------

पल-पल पलकों के आंगन से,
नहीं बहती मद्धिम धारा है,
इस तट मैं खड़ा हूं,
खत्म जहां किनारा है।

-harminder singh

2 comments:

  1. पल-पल पलकों के आंगन से,
    नहीं बहती मद्धिम धारा है,
    इस तट मैं खड़ा हूं,
    खत्म जहां किनारा है।

    बहुत मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ...मन को छू जाती हैं.

    ReplyDelete
  2. पल-पल पलकों के आंगन से,
    नहीं बहती मद्धिम धारा है,
    इस तट मैं खड़ा हूं,
    खत्म जहां किनारा है।

    बहुत संवेदनशील पंक्तियाँ

    ReplyDelete