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चुप हूं मैं

















भीगी पलकों का गीलापन,
चुभती यादों के कांटे,
मगर चुप हूं मैं, चुप,

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गरम बूंदों को भरकर,
आकाश सूना लग रहा,
बेचारा पौधा सूख गया,

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सूखी रेत पिघल चुकी,
तिनका-तिनका बह गया,
मगर चुप हूं मैं, चुप।

-Harminder Singh

2 comments:

  1. सूखी रेत पिघल चुकी,
    तिनका-तिनका बह गया,
    मगर चुप हूं मैं, चुप।... kahun to kya kahun !

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