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एक कैदी की डायरी -23

एक बार पिताजी देर रात को आये। उनके साथ एक महिला थी जिसकी उम्र मेरी मां के बराबर ही थी। उसके साथ एक बच्चा था जो मेरी आधी उम्र का रहा होगा। दादी ने पिताजी से अकेले में कुछ बात की। उनकी आवाजें एक-दो बार ऊंची भी हो गयी थीं।

दादी उस रात दुखी थी। मैं उसकी गोद में लेटा था। वह मुझे थपक रही थी। कुछ बूंदें मेरे माथे पर टपक गयीं। दादी रो रही थी।

कुछ दिनों में मुझे पता लग गया कि मेरी नई मां आ चुकी थी। पिताजी घर पर लगभग रोज आते। मुझे किसी बात की खुशी थी और किसी का दुख। मैं इतना अंजान न था। दादी की पीड़ा को समझ सकता था।

वह नयी महिला खुद काम नहीं करती थी बल्कि दादी पर हुक्म चलाती। एक वृद्धा के कष्टों का यह प्रारंभ था। एक परायी स्त्री किसी पराये घर पर कब्जा जमाने की तैयारी कर चुकी थी। मैं चुपचाप सारा कुछ देखने को विवश था। वह एक तमाशा नहीं था जिसके पात्र नकली होते हैं, बल्कि वास्तविकता घट रही थी जिसके पात्र कुछ लोग थे।

पिताजी उस महिला के पाश में फंसे थे। उसका बेटा ही उनकी आंखों का तारा था। दादी का भरोसा कब का चकनाचूर हो चुका था, बस दीवारों के दरकने का इंतजार था। मेरी मां और उस महिला के नाम ‘श’ अक्षर से शुरु होते थे। उसका नाम शीला था। राशियां एक होने से लोग एक नहीं होते। अगर ऐसा होता तो राम और रावण में कभी युद्ध न होता।

शीला का रुप रंग किसी को प्रभावित नहीं कर सकता था। पता नहीं पिताजी को उससे आकर्षण कैसे हो गया था। मैं सोचा करता था कि शीला ने उनपर कोई जादू किया होगा। एक सात-आठ साल के बच्चे की सोच कितनी होती है।

to be contd...

-Harminder Singh

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