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क्रिकेट का खेल

एक बड़े खाली मैदान पर कई बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। सूरज काफी चढ़ चुका था। गर्मी की अधिकता इस बात से स्पष्ट हो जाती कि आसमान में बादल का एक भी टुकड़ा दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था।

ट्रेन की रफ्तार धीमे हो चली थी क्योंकि स्टेशन आ गया था। खेलते बच्चों के लाल चेहरे धुंधले दिख नहीं रहे थे। वे अधिक दूर नहीं थे। कमीजों में एक-दो को छोड़ दें, तो बाकी बनियान पहने थे जो पसीने के कारण उनके गेंहुए शरीर से कसकर चिपके थे।

मैंने अंदाजा लगाया कि ये बच्चे इसी तरह नियमित ऐसे मैदान पर गेंद और बल्ले से खेलते होंगे। ऐसा मैं इसलिए सोच रहा था क्योंकि हमारे देश में क्रिकेट लोगों में रच बस गया है। दूसरा कारण यह था कि बचपन में मैंने बहुत क्रिकेट खेला है और रेलवे लाइन के किनारे हम भी एक खाली मैदान पर तपती धूप में बेफिक्री से जूझते थे। यह खेल ही ऐसा है कि बच्चों से लेकर बड़े इसके दिवाने हैं।

सफर के दौरान एक नहीं बल्कि कई जगह मैंने क्रिकेट खेलते बच्चों और बड़ों को देखा। गुजरती रेलगाड़ी को देखकर खुशी में हाथ हिलाने का फैशन काफी पुराना है। इसे हमारी आदत भी कह सकते हैं।

सिग्नल न होने के कारण ट्रेन को बीच में रुकना पड़ा। कई छात्र जो परीक्षा देने जा रहे थे, डिब्बों से उतरकर बाहर आ गये। उनमें दो एक गोल और चिकने पत्थर से ‘कैच-कैच’ खेलने लगे। जबकि उनके कई साथी कान पर मोबाइल-फोन लगाये इधर से उधर कदमों को व्यस्त रखे थे।

किसी ने खिड़की के नजदीक खड़े एक छात्र पर पानी गिरा दिया। छात्र मुस्करा कर वहां से दूसरे स्थान पर जा खड़ा हुआ। बाद में पता लगा कि यह काम उस शरारती लड़के का था जो हमारे साथ ही ट्रेन में दाखिल हुआ था। उसके माता-पिता उसके साथ थे और उसी की तरह एक नटखट बहन भी जिसका ऊपर का एक दांत गायब था जबकि उसके भाई के सभी सुरक्षित। इन बच्चों को मैं ‘उधमी’ कह सकता हूं क्योंकि डिब्बे में दाखिल होते ही उनकी शैतानियां चालू हो गयी थीं।

अगली बार उनकी ही बात होगी, सफर अभी बहुत बाकी है।

-Harminder Singh




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