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मन करता रोने का जीभर

बेसुध पड़ी काया बोलेगी क्या? कोई हलचल होगी कैसे? बिलखती औंरते, पुरूष, बच्चे। हां जिंदगी रो रही है। आंसुओं से नहाने को तैयार हर कोई। गवाह कोई नहीं, तमाशबीन हैं, लेकिन उनका हृदय भी कराह गया। जीवन जिज्ञासा लकड़ियों में जल मरी। 

"हृदय की आह है,
चीर रही दिल को,
रोती सूरतें कितनी,
दर्द से घुटतीं पल-पल।"

जीवन को अवसर मिला। कितना जिया। आज सब सूना है। मां कहती है-"अब ठिठोली कौन करेगा! कौन चहकेगा!"

डाल की हरियाली बीत गयी। खुरेचों में आसमान तलाशती बूढ़ी दादी को "अम्मा" कौन कहेगा! 

"बीत गया दिन यूं ही ऐसे,
शाख पर कल तक थी हरियाली,
बैठा करती थी मैना मौज में,
आज पतझड़ होने की तैयारी है।"

ढांढस बांध रहा पिता भी। मां कब की जमीन पर औंधी पड़ी है। बेटी थी वह उसकी। परी से नहीं थी कम। हाय! क्या हुआ। लुट गयी बस्ती उसकी पल भर में। प्यारी किसे बुलायेगी। कौन नटखट है, कौन करेगा खिलंदड़ी।

"हाय! उजड़ गयी कुटिया,
दुख है, पीड़ा है भरपूर,
बहते हैं आंसू निर्झर,
मन करता है रोने का जीभर।"

-हरमिन्दर सिंह.


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