ज़िन्दगी भी एक किस्सा है, एक कहानी है

ढेरों किस्से शुरु होते हैं और दम तोड़ देते हैं. हर कहानी अपनी छाप छोड़ती है. हर किस्सा एक नई कहानी बन जाता है.
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'ज़िन्दगी के अपने मायने होते हैं। कुछ शब्द खट्टे और मीठे हो सकते हैं। जिंदगी हमसे किसी सफर में चलने के लिए कहती है। हम उसके साथ हो जाते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं कि हम अपनी मर्जी से उसके साथ चलते हैं। हमने जिंदगी को पहन रखा है, और जिंदगी ने हमें। यह एक तरह का शानदार गठबंधन है। हम एक दूसरे से दूर कभी नहीं जा सकते। न ऐसा हो पाएगा। यह बहुत जरुरी हो जाता है क्योंकि ज़िन्दगी हमसे जुड़कर चलती है। हम उसके हिस्से हैं।' बूढ़ी काकी बोली।

मैं खामोशी से उसके चेहरे की तरफ देखता रहा। मुझे वह कुछ अजीब लगा। मैं गहरी सोच में डूब गया। सोचने लगा कि ज़िन्दगी इतनी अजीब क्यों है? क्यों हम ज़िन्दगी को समझते नहीं हैं, या हम किसी भ्रम में जी रहे हैं? क्यों ऐसा है कि हम खुद से इतने सारे सवाल करते हैं? क्या यह हमें ज़िन्दगी ने सिखाया है? क्यों ऐसा होता है कि हम ज़िन्दगी के भरोसे बैठे रहते हैं और किस्मत पलटी मार जाती है? फिर क्यों हम खुद को कोसने भी बैठे जाती हैं? क्या यह जिंदगी का दस्तूर है, या फिर हम ही इसके लिए जिम्मेदार है?

मैं बोला,'ज़िन्दगी का भी एक फर्श होता है। हम वहां जीते हैं, और मर जाते हैं। अनगिनत कहानियां यहां रची जाती हैं। ढेरों किस्से शुरु होते हैं और दम तोड़ देते हैं। हर कहानी अपनी छाप छोड़ जाती है। हर किस्सा एक नई कहानी बन जाता है। ज़िन्दगी शब्दों में सिमटी जरूर है लेकिन उसने किताब की शक्ल ले ली है। हर पल एक नई किताब ज़िन्दगी को समेट रही है। एक नई इबारत हर पल लिखी जा रही है। कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं। हर कहानी जिंदा होती है। हर कहानी बोलती है। उसकी एक अपनी कहानी है। ऐसी कहानी जो कभी ना कही गई हो। जिसे कभी ना सुना गया हो, और जो ज़िन्दगी के बिल्कुल करीब होकर गुजरती है। इस रेत पर जहां पहले कोई ना गया हो। पैरों के निशान हर जगह होंगे। कदमों की आहट हर जगह होगी। सब कुछ रेत की तरह उड़ता हुआ दौड़ता है। यही ज़िन्दगी का असली रूप है। ज़िन्दगी कहानियां-किस्से गढ़ती हुई आगे बढ़ती जाती है। ज़िन्दगी हर पल अजीब होती जाती है।'

हर पल एक नई किताब ज़िन्दगी को समेट रही है। एक नई इबारत हर पल लिखी जा रही है। कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं। हर कहानी जिंदा होती है। हर कहानी बोलती है। उसकी एक अपनी कहानी है।

इस पर बूढ़ी काकी ने कहा,' सच है यह कि हम ज़िन्दगी के मोड़ों में उलझ गए हैं। ऐसा भी लगता है कि कभी-कभी हमने खुद को स्वयं ही उलझा लिया है। हमने वक्त को अपनी तरह से मोड़ लिया है। यह हमारी जरुरतों के हिसाब से हुआ है। लेकिन ज़िन्दगी अपने हिसाब से मुड़ रही है। नई कहानियां बेहिसाब नए मोड़ और नए रास्ते चुन रही हैं। हम पेड़ पर तो चढ़ रहे हैं, शाखाओं की ओर हमारा ध्यान नहीं है। हम जमीन को नापने की कोशिश जरूर कर रहे हैं लेकिन मिट्टी की खुशबू से महरूम हैं। एक बहुत बड़ा विरोधाभास है।'

'विश्वास की टहनियों को हमने झटका दिया है। रिश्तों को हमने कहीं खो दिया है। हम भटक गए हैं। हमने अपनी-अपनी रहें चुन ली हैं। ज़िन्दगी की असली वजह को हम कभी समझ नहीं पाए हैं। उम्र का हमने कभी हिसाब लगाया तो है लेकिन उसे जीना ही भूल गए हैं। इसे क्या कहा जाए?'

काकी ने जीवन की सच्चाइयों से मुझे रूबरू कराया है। वह हर पल को नहीं निचोड़ना चाहती है।

-हरमिंदर सिंह.

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3 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सुरैया और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. Its such a wonderful post, keep writing
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