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दो तरह की मानसिकता


प्लेटफार्म पर मैं ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मैं वहां कुर्सी पर बैठ गया। तभी एक वृद्ध भी मेरे पास आकर बैठ गये। उनकी मूछें थीं जिनका रंग बिल्कुल सफेद था। उन्होंने बताया कि वे पास के गांव के हैं। वे अपनी पोती को इम्तिहान दिलाने आये थे। उनका कहना था कि लड़की अकेली कैसे आ सकती है? मैंने कहा,‘क्यों? एक्साम देने दूसरी लड़कियां भी तो घर से अकेली ही आयी हैं।’

उन वृद्ध ने कहा कि वे यह नहीं जानते। उन्हें अपनी लड़की की फिक्र है। उन्होंने जमाने की दुहाई देकर कहा कि जमाना खराब होता जा रहा है। अकेली लड़कियों को यूं ही छोड़ा नहीं जाता। उनका मत था कि लड़की को समाज में रहने के लिए सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना ही पड़ता है।

तभी एक और व्यक्ति वहां आकर बैठ गये। उनकी वार्ता काफी समय तक उन वृद्ध से होती रही। पता लगा कि वे व्यक्ति उनके पास के गांव के ही हैं, लेकिन नौकरी करते हैं कहीं ओर। छुट्टियों में गांव जा रहे हैं। चर्चा में मैंने शामिल होना उचित नहीं समझा। मैं मच्छरों से मुकबाला करने में व्यस्त था। कुछ देर में मैं सीट से उठकर प्लेटफार्म पर टहलने लगा। इंतजार कर रहा था रेलगाड़ी का और वह थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी।

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सुबह बारिश हुई थी, हवा चलती तो ठंड सी महसूस होती। मैं कुछ समय घूमकर फिर वापस आकर उन दोनों व्यक्तियों की बातें सुनने लगा। बीच-बीच में मैं मुस्करा जाता। उस व्यक्ति ने वृद्ध से कहा कि आपको लड़की की शादी करनी है, तो फिर पढ़ाई किस लिए? इसपर वे बोले कि पढ़-लिख कर कुछ बने या न बने, कम से कम यह तो हो जायेगा कहने को कि लड़की पढ़ी-लिखी है, ग्रेजुयेट है।

मुझे उन वृद्ध की पहली बात अजीब लगी जब उन्होंने कहा था कि लड़की अकेली नहीं हो, जबकि वे उसकी शिक्षा के पक्षधर हैं। इससे उनकी दो तरह की मानसिकता का पता चलता है। वे लड़की को उतनी स्वतंत्रता देना नहीं चाहते क्योंकि वे शायद उस समाज से आते हैं जहां लड़की को हमेशा एक तरह से सुरक्षित किये जाने को वरीयता दी जाती है। जबकि बदलते समाज के साथ उन्हें इतना मालूम हो गया कि शिक्षा भी जरुरी है। वे विचारों में कमजोर भी हैं, और कुछ-कुछ जागरुक भी लगते हैं। यह हमारा समाज ही है जिसके कारण यह सब हो रहा है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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