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सचिन की पोट्रेट


सचिन तेन्दुलकर की एक पोट्रेट मैंने कई साल पहले बनाई थी। इसे बनाने में घंटो लग गये। चित्र बनाने के शौक के कारण मैंने बहुत से लोगों को कागज पर उतारा। इसे बाॅल पैन से बनाया गया था। उस दौरान मैंने दूसरे लोगों के चित्र भी बनाये।

पैंसिल के मुकाबले बाॅल पैन से चित्र बनाना उतना आसान नहीं होता। बहुत सावधानी के साथ हर रेखा को खींचना पड़ता है। यह बहुत श्रम का काम है। तभी मुझे घंटो लग जाते चित्र उकेरने में। सोच समझकर ऐसे मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए गंभीर होना आवश्यक है। एक बात और यहां गलती होने पर आप उसे सुधार नहीं सकते। कारण कि बाॅल पैन की स्याही कागज में उतर जाती है जिसे मिटाना आसान नहीं। यदि मिट भी जाये तो कागज की परत उधड़ जाती है और चित्र में वो बात नहीं रहती।

आज सचिन तेन्दुलकर की हर जगह फजीहत हो रही है। मुझसे पूछा कि पहले आप उनके कायल हुआ करते थे जो आपने उनका चित्र बना दिया। मेरा जबाव था कि चित्रकारी करने के लिए कायल होना आवश्यक नहीं। चित्र तो हम किसी का भी बना सकते हैं। यह काम स्वतंत्रता के साथ किया जाता है। यहां उसकी औकात नहीं देखी जाती। एक साधारण इंसान या ‘महान’ कही जाने वाली हस्ती दोनों मेरे लिए बराबर हैं। चित्र बनाना कला की प्रस्तुति है।

हंसता हुआ सचिन
सचिन की पोट्रेट में उनके दातों को बनाना सबसे मुश्किल काम था। उन्हें हंसता हुआ दिखाना था, लेकिन एक मासूमियत के साथ। मैंने कोशिश की और मुझे लगता है कि काफी हद तक इस चित्र के साथ न्याय कर पाया। मैं इसे ‘हंसता हुआ सचिन’ कहता हूं।

आज जब सचिन तेन्दुलकर की वाहवाही नहीं की जा रही तब मैं चाहूंगा कि उनका गंभीर मुद्रा में चित्र बनाऊं। ऐसा करने के बाद मेरे पास उनकी दो मुद्रायें हो जायेंगी -हंसी और गंभीर।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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