इंसान और कुत्ता



मौसम की करवट हैरान नहीं करती। समय के साथ उसमें बदलाव जायज़ है। सर्दी का अहसास हो रहा है, बल्कि सर्दी ही हो रही है। मैं आजकल जर्सी पहन रहा हूं। यह इस मौसम के लिये ही तो है।

लोग सुबह कंबल ओढे आपको दिख जायेंगे। सड़क किनारे अलाव तापते लोग, चाय की दुकान पर चाय का आनंद लेते लोग भी दिखेंगे। 

सुबह जब निकला तो अंधेरा था। समय यही कोई 5 बजे का होगा। चौराहे पर मंदिर के पास कुछ लोग आग जलाकर बैठे थे। चंद लकड़ियां और आसपास पड़े कागज आदि से तैयार किया यह इंतजाम उन्हें निश्चित ही बहुत राहत पहुंचा रहा होगा। 

एक कुत्ता भी नजदीक खड़ा था। वह बहुत शांति से खुद को शीत से सुरक्षित महसूस कर रहा था।
मैंने सोचा कि इंसानों के साथ आज यह कुत्ता भी मौसम से खुद का बचाव कर रहा है। वह उन्हें मन से शायद धन्यवाद भी दे रहा होगा। यदि वह ऐसा करे न तो भी वह वहां काफी देर तक खड़ा रह सकता है। लोग उसे कुछ नहीं कह रहे थे क्योंकि वे खुद ठंड से अपना बचाव कर रहे थे। 

यह उनकी मजबूरी थी। मजबूरी में हमारा ध्यान दूसरी बातों पर केन्द्रित न रहकर मुख्य बिन्दु पर रहता है। 

खैर, जानवर वहां भी इंसानों के भरोसे था, लेकिन किस्मत से।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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