मोबाइल से पोस्टिंग


बादल पीछा छोड़ने वाले नहीं थे। देर रात बारिश हुई। जब मैं दो बजे उठा तो पाया कि बूंदें गिर रही हैं। बादलों की गड़गड़ाहट नहीं थी। हां, बूंदों के गिरने से तड़तड़ाहट जरूर थी। मेरी नींद खुल ही गयी। उसके बाद सोने का मन किसी कीमत पर कर भी नहीं सकता था।

मेरे साथ पहले भी ऐसा हुआ है कि एक बार नींद टूटी तो सोने की जरूरत महसूस नहीं होती। फिर तो आंखें खुल जाती हैं। कुछ लिखने का मन हुआ। मैंने लिखने के लिये कलम नहीं उठाया। सीधे मोबाइल पर टाइपिंग शुरू कर दी। तीन-चार लाइन लिख पाया था कि किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी।

उस समय कौन हो सकता था? मैंने सोचा। देखा तो दूर के रिश्तेदार निकले। गांव जा रहे थे। दिल्ली से गजरौला आते हुये रास्ते में उनकी कार खराब हो गयी। कई घंटे लगे ठीक होने में। गजरौला पहुंचते ही बरसात होने लगी। तभी उन्हें हमारे बारे में ध्यान आया। वे पिछले साल यहां आये थे।

कार के साथ उन्हें समस्या थी कि वे बरसात में उसे चला नहीं सकते थे। ऊपर से बीस किलोमीटर दूर गांव जाने वाले रास्ते की हालत बेहद खराब थी। गाड़ी कहीं बीच में खराब हो गयी तो स्थिति चिंताजनक हो सकती है।

तीन बजे तक हम सब जगे हुए थे। कार वाले रिश्तेदार के साथ दो बच्चे थे जबकि बच्चों की मां पहले ही गांव में थी।

उनकी आवभगत करने के बाद मैं रजाई में सिमट गया। लगभग पांच बजे तक मैं मोबाइल में लिखता रहा। पिछले कई महीनों से मैं एक एप के जरिये यहां पोस्ट लिख रहा हूं। इसके बारे में अलग से एक लेख लिखने की सोच रहा हूं।

एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि मोबाइल पर टाइप करते हुए हम अपने मन के विचारों को काफी पैनापन दे पाते हैं। हमारे विचार एक तरह से बाहर बहुत ही सटीकता से आ जाते हैं। मेरी स्पीड पहले से काफी सुधर गयी है।

कुछ लोगों को लगता है कि बिना मतलब के मोबाइल पर टाइप कर रहा हूं या खेल रहा हूं। उन्हें समझाने से मुझे कोई लाभ नज़र नहीं आता।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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