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जूते की सोल

सुबह जब मैं घर से निकला तो मौसम बरसाती था। बादलों की कई परतें थीं जो बिना शोर के बरस रही थीं। अंधेरा नहीं था लेकिन दिन शाम का अच्छा-खासा एहसास करा रहा था।

मुझे घर से निकलते समय याद दिलाया गया था कि मुझे पुराने जूतों का मोह छोड़ देना चाहिये। हद होती है इतने लगाव की। सालों पहले किलोमीटरों की दौड़ कर चुका। हर मौसम का मुकाबला किया जूतों ने। रंग ज्यों का त्यों बना रहा। एक-दो जगह मामूली चटक जरूर हुई लेकिन साथ नहीं छोड़ा।

ओवरब्रिज का निर्माण गजरौला में जारी है। काम दिन-रात हो रहा है। मिट्टी आदि को बेतरतीब तरीके से इकट्ठा किया गया है। कीचड़ तो जैसे रास्ते की शोभा बढ़ा रहा है। लोग फिसल रहे हैं, गिर रहे हैं और गालियां बकते हुए घर या अस्पताल जा रहे हैं।

मैं बूंदों से बचने के लिये तेज कदमों का सहारा ले रहा था। डामर की सड़क पर बेफिक्री थी। वहां फिसलने का भय नहीं था। गीले होने के कारण जूते कच्चा रास्ता आने पर कई जगह जमीन से चिपके, धंसे और फिसले। मैं बचता-बचाता चलता रहा। कुछ दूरी चलने के बाद एक जूते की सोल आधी हट गयी। फिर एक जगह जूता चिपका तो सोल का बाकि हिस्सा अलग हो गया। हालांकि वह पूरी तरह जुदा नहीं हुई थी। मैं पैर उठा पाने में असमर्थ था। कदमों को धीरे-धीरे रखना मेरी मजबूरी थी। दो-तीन लोगों ने टोका भी, लेकिन मैंने उन्हें जूते का हाल बताया। सांत्वना हर किसी ने दी। सहायता या उपाय किसी के पास नहीं था। कुछ मेरी हालत को देखकर खिलखिलाये भी। मैं भी उन्हें देखकर मुस्करा दिया।

किसी रिक्शा या आटो में बैठ सकता था, लेकिन मेरी कंजूसी निकलकर बाहर आ गयी थी। समय की कद्र करना भूल गया था। पैसे की फिक्र कर रहा था। कमाल यह था कि मैं भीगने को मजबूर था। सबसे मजेदार यह था कि मेरे फोन का बैलेंस खत्म था। घर और दोस्तों से संपर्क नहीं किया जा सकता था।

मेरे दिमाग ने काम नहीं किया। मैं सोल को अलग कर सकता था। घर आकर ढंग से देखा तो पाया कि वह सोल की निचली परत थी। उसे आसानी से अलग किया जा सकता था।

मैं बिना मतलब के पैर घिसता हुआ चला।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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