मस्त और बिंदास काका





बूढ़े काका काफी मस्त इंसान हैं। उम्र 80 साल से ज्यादा है, मगर जोश जवानों सा है। कहते हैं-‘‘हर पल यहां जीभर जियो, क्या पता कल हो न हो।’’ वैसे इसे मैंने एक फिल्म में सुना था। काका को वह फिल्म इतनी पसंद आयी कि ये शब्द उनके फेवरेट बन गये।

एक बात जरुर है कि हमारे काका बूढ़ी काकी से बिल्कुल उलट हैं। कहते हैं-‘‘मैं बिंदास हूं। अपनी शर्तों पर लाइफ जी रहा हूं। हंसी-खुशी से बुढ़ापा जीने के लिए मशक्कत काफी करनी पड़ती है। सो, भैया कोशिश ने मन को मना लिया। जीवन सीरीयस से मस्त करने की कोशिश जारी है। क्या पता कल हो न हो।’’

काका मुझे टहलते हुए मिल जाते हैं। बस फिर क्या ढेरों बातें कर बैठते हैं। काका बूढ़े जरुर हैं, मगर नये संगीत, वो हिप-हाप वाला, उसे भी पसंद करते हैं। लेकिन एक बात कहते हैं-‘‘बुराई कहीं कुछ नहीं, सिर्फ सीमा में रहना चाहिए। तड़क-भड़क कई बार फूहड़ता पैदा कर देती है, वह गलत है।’’

बूढ़े काका को गली के बच्चे प्यार से ‘काकू’ कहकर पुकारते हैं। मैंने हमेशा उन्हें ‘काका’ कहा है।

अपने बेंत के साथ सुबह-सवेरे टहलने निकल पड़ते हैं। लोग राह में उन्हें इज्जत बख्शते जाते हैं। उन्हें नमस्ते करने वालो की संख्या काफी होती है। ‘राम-राम’ लेते हुए काका मस्त चाल में चलते जाते हैं।

-harminder singh

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