जिंदगी मीठी है





‘‘मुझे उजाले की तलाश है। मन में एक आस है। अंधेरे में रहते-रहते खुद को भूल गयाी। मुझे जगना है उस सवेरे के लिए जो मुझसे कोसों दूर है। मुझे एहसास है कि मैं इतना थक गयी हूं कि आगे बढ़ नहीं सकती। मेरी पहचान गुम होती जा रही है। मैं हारती जा रही हूं। बुढ़ापा है, तन्हाई है। लेकिन मैं खुद को पीछे नहीं हटने दूंगी क्योंकि जिंदगी मीठी थी, मीठी है और अंतिम सांस तक रहेगी। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले की मिठास और अबकी मिठास में जमीन आसमान की दूरी है। यह दूरी कभी तय नहीं की जा सकती। वक्त पकड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि जिंदगी उसका मुकाबला करने के लिए नाकाफी है।’’ बूढ़ी काकी ने मुझसे कहा।

मेरी आंखें बंद हो गयीं। मैं स्वप्नलोक में काकी की कही बातों के अर्थ खोजने निकल पड़ा। इसी खोज के साथ कि बुढ़ापे में भी ‘जिंदगी इतनी मीठी क्यों?’

बूढ़ी काकी से इसे किसी दिन विस्तार से जानूंगा।

-harminder singh

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