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कुछ मौसम दोबारा नहीं आते





















बूढ़े काका आज थोड़े खामोश दिख रहे थे। उन्हें मामूली खांसी भी थी।

‘आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही।’ मैंने कहा।

‘बूढ़ों की तबीयत ठीक ही कहां रहती है।’ काका इतना ही बोले।

लेकिन काका तो जिंदादिली की मिसाल हैं। उनका दिल आज भी जवानों सा है। वे खुशमिजाज व्यक्तित्व वाले इंसान हैं।

‘आप खामोश हैं इसलिए कहा।’

‘भला मैं चुप भी नहीं बैठूं क्या?’

‘आपकी मर्जी।’

बूढ़े काका थोड़ा खांसकर मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले,‘शरीर के पुर्जे हमेशा नये तो रहते नहीं। मौसम यहां भी बदलता रहता है, मगर इंसान की बदकिस्मती यह है कि कुछ मौसम ऐसे होते हैं जो दोबारा लौट कर नहीं आते। काश! इन बूढ़ी हड्डियों में फिर से जान पड़ जाए। मैं जानता हूं और दुनिया के हर इंसान की हड्डियों में दोबारा जान नहीं पड़ सकती। मैं दोबारा जवान नहीं हो सकता। नहीं लौट सकता उस वक्त में जब सब आज जैसा धीमा और थका हुआ नहीं था। सचमुच इंसान बीते वक्त को पाने की सिर्फ हसरत लिए इस संसार से चला जाता है क्योंकि कुछ चीजें कभी मुमकिन नहीं होतीं।’

काका मेरी नजर में बूढ़ी काकी की तरह दाशर्निक हैं। उनकी जीवन की समझ और उम्र के अनुभव मैं ग्रहण करता रहता हूं।

बूढ़े काका बोले,‘जीवन की तुम्हारी समझ अभी उतनी नहीं, मगर एक बात जान लो कि उम्र हमारा पीछा नहीं छोड़ती। जवानी की छांव में हम कुलांचे मारते हैं। पर जब बुढ़ापा सामने खड़ा होता है, तब सोच में पड़ जाते हैं।’

‘ऐसा क्यों होता है काका?’ मैंने पूछा।

काका बोले,‘.........क्योंकि कुछ मौसम दोबारा नहीं आते।’

-Harminder Singh

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