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बूढ़ा आदमी

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किसी बूढ़े व्यक्ति को देखकर कई बातों का सहज अंदाजा हो जाता है। उसकी वास्तविकता हमारे सामने प्रस्तुत होने में देर नहीं लगती। उसकी खामोशी भी बहुत कुछ बयान कर देती है। वह जिंदगी से कितना खुश है। जिंदगी उसके लिए पहाड़ बनकर खड़ी है या वह उससे जंग जीतने की कोशिश कर रहा है, यह भी मालूम चलते देर नहीं लगती।

जब भी मैं बाहर होता हूं जाने कितने ऐसे लोगों से दो-चार होता हूं जिनकी उम्र बुढ़ापे की हो चुकी या होने जा रही है। जब मैं उन्हें देखता हूं तो मेरे भीतर भावों का एक अलग तरह का संग्रह करवटें लेने लगता है। मैं सोच में पड़ जाता हूं।

मेरा मन कहता है कि जिंदगी में उम्र बढ़ती जाती है और इंसान जैसा पहले था वैसा नहीं रह पाता। उसमें बदलाव हो रहे होते हैं। उनमें तेजी होती है। हम इसे महसूस करें, न करें लेकिन इंसान वाकई बहुत तेजी से बदल रहा होता है। यह लगता इसलिए नहीं क्योंकि हम उसके करीब रहते हैं और कई चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि जो व्यक्ति आपको एक महीने बाद देखेगा वह उस फर्क को महसूस कर सकता है। यह तब होता है जब आप बूढ़े हो रहे होते हैं। बहुत से लोगों में यह बदलाव उतनी तेजी से नहीं आता।

बहुत कुछ बदलता है। ऐसा नहीं कि आपका पूरा शरीर बदल रहा है। शरीर के कई हिस्से बदलते हैं। त्वचा को देखकर हम अंदाजा आसानी से लगा लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वह दिखती है। जो छिपा है, उसके विषय में हमारा ध्यान नहीं जाता।

एक व्यक्ति जब मेरे करीब आकर बैठा तो मेरा ध्यान उसके हाथों पर गया। मैंने उसके चेहरे को नहीं देखा, न मैं उसे पूरा देख पाया, देखे सिर्फ हाथ। अंदाजा सरलता से लगा लिया कि वह व्यक्ति बूढ़ा है। उसी तरह बहुत बार हम ऐसे ही अपनी राय बना लेते हैं जिसे मैं गलत नहीं कह रहा।

हम कह सकते हैं कि शरीर बूढ़ा होता है। शरीर कमजोर पड़ता है। उसकी उम्र ढलती जाती है। पुर्जे भी समय के साथ अपनी क्षीणता का परिचय देते हैं। यह जबाव होता है कि जिंदगी की गाड़ी थमने जा रही है। कोई बुला रहा है। बुलावा कैसा भी हो, जाना है। इंसान न भी करे, लेकिन इस बुलावे के लिए उसकी ‘न’ और ‘हां’ का मतलब नहीं रह जाता। उसे जाना ही पड़ता है।

प्रश्न हैं मेरे कि इंसान बूढ़ा क्यों होता है? क्यों झुर्रियां पड़ती हैं? क्यों जिंदगी की गाड़ी थमती है? क्यों कोई जाता है वापस न लौटकर आने के लिए? क्यों होता है ऐसा कि किसी को आंसू बहाने पड़ें? क्यों सांस रुकती है?

शायद ये सवाल हैं बिना उत्तर के और उत्तर मिले तो भी उत्तर की तलाश बरकरार है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.
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