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दादी की कहानी

दादी की पोटली में शाम के लिये ढेरों कहानियां होती थीं। मुझे आजतक हैरानी होती है कि उनके पास हर बार सुनाने के लिये नयी कहानी होती....

दादी ने मुझे बचपन में बहुत कहानियां सुनाईं। मैं उनमें खो जाता था। वह मुझे वास्तविक लगता। रोमांच कण-कण में भर जाता। ऐसा लगता जैसे सबकुछ सामने घट रहा है। उनकी कहानियों में जादू था।
गरमी की छुट्टियों में हम गांव जाते थे। मुश्किल से आधे घंटे का रास्ता था। उसमें पांच मिनट सड़क से पैदल चलना होता था। 

गांव का माहौल हमेशा घर जैसा रहा। दिन भर हम बच्चे घूमते रहते। कभी किसी की बगिया में जा धमकते। कभी आम के बाग में आम तोड़ रहे होते। किसी ने आजतक टोका नहीं। गांव की यह विशेषता मुझे सबसे अच्छी लगती थी। स्थितयां आज भी नहीं बदली, सिर्फ बाग-बगिया कम हो गये।

दादी की पोटली में शाम के लिये ढेरों कहानियां होती थीं। मुझे आजतक हैरानी होती है कि उनके पास हर बार सुनाने के लिये नयी कहानी होती। वे चारपाई पर बैठ जातीं। हम बच्चे जिनमें गांव के मेरे सभी मित्र होते, उनके चारों ओर बैठे होते। कुछ मूढों पर जगह से ज्यादा टिक जाते। लगभग दस-बारह बच्चों का समूह एकत्रित हो जाता।

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कहानियों का दौर लगभग एक घंटे का होता। समय कब गुजर जाता पता नहीं चलता। उसके बाद दादी सभी बच्चों को आम काटकर प्लेट में सजा देतीं। हम बहुत खुश होते।

दादी दुनिया में नहीं। उनकी तरह उनके द्वारा सुनाई कहानियां अभी तक जीवित हैं। 

harminder singh

photo source : google

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2 comments:

  1. वृद्ध जन के पास जो ज्ञान शक्ति है वह किसी पुस्तक में नहीं मिल सकती

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    1. आपने सही कहा महेन्द्र जी...
      वृद्धों का अनुभव हमें जीवन के कठिन रास्तों पर भी सरलता से चला सकता है।
      आभार!

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