मालिश वाला बूढ़ा


















ट्रेन चलने लगी तो कुछ लोग खिड़की से मुझे दौड़ते नजर आये। यह क्या ट्रेन रुक गयी। किसी ने बताया कि गलती से चालक ने गाड़ी चालू कर दी।

‘अभी समय है।’ उसने कलाई पर बंधी कमजोर काले फीते की घड़ी मुझे दिखाई।

पांच मिनट शेष थे, जैसाकि मैं समय-सारिणी में देख चुका था। चलिए बेचारे यात्रियों को भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ेगी। तसल्ली से ट्रेन में आइये, आपका स्वागत है।

उन वृद्ध महिलाओं को (जिनका जिक्र सफरनामा की पिछली पोस्ट में किया था) मैंने अगले डिब्बे में जाते हुए देखा था। मैं खिड़की से प्लेटफार्म का नजारा देखने में व्यस्त हो गया। लकड़ी की बेंच पर एक वृद्ध जिसकी सफेद दाड़ी और बाल भी खुले थे, नहाकर आया था। उसके पास बैग तथा पालीथिन में सामान था।

सफेद बनियान पहनने से पहले उसने शरीर की मालिश की थी। आने-जाने वालों ने उसे ऐसा करते देखा तो आपस में बातें करने लगे। एक महिला मुस्कराती हुई उसे देखती रही। आगे चलकर उसने अपने साथ चल रही दूसरी महिला से बतियाना शुरु कर दिया। मुझे लगता है उन्हें प्लेटफार्म पर एक बूढ़े व्यक्ति को उस तरह मालिश करते देख हैरानी हो रही थी।

उस वृद्ध की मुझे यह बात अच्छी लगी कि वह इतनी उम्र में भी अपने बूढ़े शरीर की देखभाल कर रहा था। मैं उससे वार्तालाप कर सकता था और बुढ़ापे के बारे में उसके अनुभव हासिल कर सकता था, पर मैं ट्रेन में था और गाड़ी किसी भी वक्त चलने वाली थी।

मुझे खुशी हुई कि बुढ़ापा अभी थका नहीं है। वह अपना सफर जारी रखे है। वह बूढ़ा व्यक्ति संतुष्ट लग रहा था। मगर उसका अपना उसके साथ नहीं था, फिर भी वह भरोसे के साथ था।

ट्रेन चलने लगी थी। पीछे छूटता जा रहा था वह सब जो कुछ समय पहले आगे था। गति की निरंतरता के कारण यह घटा था इसलिए वही इसकी उत्तरदायी भी थी। चुपचाप बैठा था मैं किसी सोच में डुबाये स्वयं को। लोहे के पहियों की रफ्तार जारी थी और गर्म होती पटरियों के कारण ध्वनि फैल रही थी।

जारी है....

-harminder singh

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