यह बूढ़ा अड़ा रहेगा

सच में एक वृद्ध जिसकी चमड़ी समय के साथ-साथ ढांचे से मिलन की आस लगाये है ताकि उसके और करीब जा सके, वह अड़ा है। उसका हौंसला कम होता नहीं दिख रहा.

बूढ़े काका कुर्सी पर बैठे कोई गीत गुनगुना रहे थे। गीत के बोल समझ नहीं पाया, लेकिन तर्ज जानी-पहचानी लगी।

मैं उनके बगल में बैठ गया। एक वृद्ध को देखने लगा जो बुढ़ापे को भुला चुका था। शरीर दुर्बल होते हुए भी दुर्बल नहीं लग रहा था क्योंकि मन दुर्बल नहीं था। बूढ़े काका स्वयं को समझाते रहते हैं ताकि बुढ़ापा बोझिल न लगे।

‘आप बुढ़ापे को मात देने पर तुले हैं।’ मैं कहा।

बूढ़े काका बोले,‘मैं मनमौजी और मस्त रहने वाला इंसान हूं। कोशिश कर रहा हूं खुद से बचने की, लेकिन लगता है उम्र ऐसा करने नहीं देगी। मैं अड़ियल भी हूं। अपनी कोशिश जारी है। जबतक इन बूढ़ी हड्डियों में जान रहगी, यह बूढ़ा इसी तरह अड़ा रहेगा।’

सच में एक वृद्ध जिसकी चमड़ी समय के साथ-साथ ढांचे से मिलन की आस लगाये है ताकि उसके और करीब जा सके, वह अड़ा है। उसका हौंसला कम होता नहीं दिख रहा।

मैंने अपना मोबाइल फोन उन्हें दिखाते हुए कहा,‘यह काफी पुराना हो गया, मगर मैं इसका साथ नहीं छोड़ना चाहता।’

काका हंसकर बोले,‘एक मशीन से इतना लगाव। मेरी लाठी मुझसे दूर नहीं जाना चाहती, न मैं। मगर यह बुढ़ापे का सहारा है। कुछ चीजें मृत ही सही, हम उन्हें खुद से जुदा करना नहीं चाहते जबकि हमें मालूम है कि उन्हें एक बार नहीं अनगिनत बार बदला जा सकता है।’

मैं काका के चश्मे से आरपार धुंधली तस्वीर देख पा रहा था। वहां भेद कर पाना मुश्किल था कि कौन जीवित है, कौन मृत।

काका मस्ती में फिर कोई नया गीत गुनगुनाने लगे।

-Harminder Singh

1 comment:

  1. क्या कहूँ आपकी आज की रचना ने मुझे निशब्द कर दिया।
    समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपजा स्वागत है।
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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