तमाशा बन गया मैं

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समय
गुजर गया,
अकेला हूं मैं,
खोज रहा स्वयं को,
ठहर कर चुपचाप,
बंद आंखों को किए.

स्याह पलों का रुखापन,
खुरदरा कर गया कुछ,
इन कांपती उंगलियों में,
सजवाट नहीं रही बाकी.

बिखरती जिंदगी के टुकड़े,
छिन्न-भिन्न हुए,
तमाशा सिर्फ तमाशा
बन रह गया मैं,
कोने में पड़ा सूखा पत्ता,
और मैं,
खड़खड़ाता वह भी है,
लेकिन मृत है।

-Harminder Singh


4 comments:

  1. आज बहुत दीनों बाद आपके इस ब्लॉग पर कोई रचना आई जिसका मुझे इंतज़ार रहता है। सच को ब्यान करती खूबसूरत अभिव्यक्ति शायद बुढ़ापे में ज़िंदगी कुछ ऐसी ही प्रतीति होती हो जैसा आपने व्यक्त किया है।

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  2. सत्य को व्यक्त करती मार्मिक रचना

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  3. जीवन का यह भी एक रूप है!

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  4. जीवन के कडुवे लेकिन शाश्वत सत्य को लिखा है आपने इन पंक्तियों में ... जीवन के ऐसे पल ठीक गुजरने चाहियें ...

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