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एक कैदी की डायरी -36

jail diary, kaidi ki diaryमेरी मां जिंदा होती तो परायी स्त्री हमारे घर में कभी कदम न रखती। वह कभी सोच भी नहीं सकती थी पिताजी दूसरी महिला को घर में पनाह देंगे और मेरी मां को भूल जायेंगे। कितना व्यथित हो रही होगी वह, जहां भी होगी। पिताजी को मां से प्यार था, पर उसके गुजरने के बाद क्या हुआ? सब बदल गया मां के जाने के बाद।

पिताजी पर उस आदमी ने लात से प्रहार किया। इतने वे कुछ समझ पाते उसने एक भारी मुक्का उनके पेट में जमा दिया।

वह व्यक्ति उठा और पिताजी को टांगों के बल घसीट कर पलंग से नीचे गिरा दिया। पिताजी लगभग बेहोश हो गये थे। उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था।

मैं उनके पास दौड़ा। उस आदमी ने मेरे जोर का तमाचा मारा। मैं नजदीक रखी बेंच की किनोर से जा टकराया। मेरा सिर उससे जा लगा और मैं बेहोश हो गया।

मुझे मालूम नहीं मैं कितने समय ऐसे ही पड़ा रहा। आंख खुली तो पिताजी को जमीन पर गिरे पाया। दोनों हाथों से जोर लगाकर मैं उठ खड़ा हुआ। अपनी आंखों को मला।

पिताजी के सिर से खून बह रहा था। उनका चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था और खून से सना था। खून बहकर मेरे पास तक आ गया था। मैं उनके शरीर को हिलाने लगा। कोई हलचल नहीं हुई। मैंने उनके हाथों को अपने हाथों से मला।

वे बिल्कुल शांत थे। उनकी स्थिति जानने के लिए मैंने अपना कान उनकी छाती पर लगाया। किसी तरह की कोई आवाज या धड़कन मुझे सुनाई नहीं दी। पिताजी का शरीर ठंडा पड़ चुका था। उनकी नाक पर अंगुली लगाई। वहां कुछ था ही नहीं। उनकी सांसें थम चुकी थीं। वे मर चुके थे। उनका हाथ मेरे हाथ में था।

मैं आंसू रोक नहीं पाया। सिसक-सिसक कर रो रहा था मैं। मां के बाद पिता का साया सिर से सदा के लिए उठ गया। मैंने पिताजी के चेहरे को गौर से देखा। उनकी आंखें खुली थीं, छत को निहार रही थीं। खुला आसमान छत की चादर था।

मुझे पता था पिताजी को सफेद चादर ओढ़नी थी। आखिरी बार की विदाई और लंबी नींद के लिए चादर को पूरा तन ढकना था।

हृदय के टूटने का सिलसिला जारी था। प्यारे सपनों के दरकने की आवाजें पहले आयीं जरुर थीं, लेकिन इस बार सपनों के टुकड़े भी शेष न रह गये थे। न बची थी कोई आस जो लगे कि हां, हम कर सकते हैं।

तबाही ने सब लूट लिया था। छोटा पौधा बिना पतझड़ के वस्त्रहीनों की भांति इधर-उधर ताक रहा था, उसे अब चिथड़े की आस भी न थी। उसकी आंखें भरी जरुर थीं क्योंकि उसका हृदय रोया था, तड़पा था। उसका प्रेम उमड़ आया था। उसके पास अब बचा ही क्या था।

जारी है.....

-Harminder Singh

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