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एक कैदी की डायरी -38

jail diary, kaidi ki diary, vradhgram, harminder singh, gajraulaलाजो को फिर से याद करना मेरी विवशता हो गयी है। लगता है अपने बच्चों से अधिक मैं अपनी पत्नि से प्यार करता हूं। मेरे लिए बच्चे और पत्नि उतना ही महत्व रखते हैं, मगर पत्नि का चेहरा कई दिनों से मेरी आंखों के सामने उभर रहा है।

सोते-जागते बस वही नजर आती है। ऐसा लग रहा है जैसे वर्षों बाद प्रेम जाग उठा है। यह प्रेम ही था जो मैं उसे भूल नहीं पाया। उसी तरह जीवित है मेरा प्रेम।

लाजो का चेहरा आज भी सुनहरा लगता है। वह हंसती हुई कितनी अच्छी लगती है। उसकी एक मुस्कान कितनी कीमती है, यह केवल मैं ही जान सकता हूं। वह मुझे मायूसी से बचने को प्रेरित करती है। लाजो मेरी प्रेरणा है, मेरा सब कुछ, मेरी जिंदगी, मेरी आस।

सपनों में अक्सर वह दिख जाती है। बहुत बोलती थी पहले भी, अब भी वैसी ही है। क्या वह बिल्कुल उसी तरह खिलखिलाती होगी?

लाजो से मैं घंटों बातें करता रहता हूं। कुछ पुरानी यादों को ताजा करने का मौका मिल जाता है, कुछ नये पलों को जोड़ कर दर्द कम कर लेता हूं। वह साक्षात हो जाती है।

कल ही मैंने उससे पूछा कि वह मेरे बिना कैसे जी रही है? तो वह केवल मुस्काई, पर बाद में गंभीर हो गयी। सादाब के बाद लाजो का साथ मैं निभा रहा हूं।

हम अकेले पड़ जाते हैं, तो निराशा हमें घेर लेती है। इसी बीच हमारा मन उद्वेलित होता रहता है, और हम किसी का साथ चाहते हैं। मैं वास्तविकता को नकार नहीं सकता, पर मजबूरी में मन को शांत करने के लिए लाजो न होते हुए भी मैं उससे बात करता हूं। उसकी तस्वीर इधर-उधर तैरती है। मैं उसे धुंधला नहीं पड़ने देना चाहता, इसलिए एकटक निहारता हूं। सपना खत्म होने के बाद मुस्करा रहा होता हूं।

-Harminder Singh


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