एक कैदी की डायरी -45


jail diary, kaidi ki diary, vradhgram, harminder singh, gajraulaकुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी फिक्र उतनी न रहे, लेकिन दूसरों के लिए वे बड़े सहारे की तरह होते हैं। ऐसे लोगों को मैंने कम देखा है। ज्यादातर लोग खुद को ही सब कुछ मानते हैं। उनका नजरिया सीमित होता है। दूसरों के भावों को अहमियत देना शायद उन्हें भाता नहीं। लाजो से मेरा लगाव बढ़ता जा रहा था। यह सब उसकी प्रवृत्ति के कारण भी हो रहा था। वह साफ हृदय की है। मन के मैल की बात उसके विषय में कैसी की जा सकती है। वह उन चंद लोगों में से है जो अपना दुख नहीं देखते, बल्कि ओरों का कम करने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को ईश्वर ने बनाया ही इसलिए है ताकि जिंदगी से रुसबा लोगों को कोई तो संभाल सके। ये वास्तव में भगवान का काफी काम आसान कर देते हैं। मैं लाजो को लक्ष्मी की ही तरह मानने लगा था।

मुझे कमाल लगता है कि मेरा हृदय पागल ही था। जहां मुस्कराहट देखी, उसी का हो गया। सुना था पर जब स्वयं को उस स्थिति में पाया तो लंबी सोच में पड़ना स्वभाविक था। पहले लक्ष्मी को अपना मान चुका था। वहां हृदय ने जबरदस्त चोट खाई। इस सोच में भी था कि कहीं यहां ऐसा न हो जाए। फिर सोचने लगा कि शायद हृदय टूटने और जुड़ने के लिए ही बना है। सफर चलता रहता है, लोग मिलते रहते हैं और बिछड़ते रहते हैं। सारी जिंदगी यह चलता है। इंसान दिल लगाता है, वक्त दरार बनाता है और सिलसिला चलता रहता है। मैं क्या करुं? मुझे मन को समझाना नहीं आता। ये सब से बाहर है। कई बार हैरानी इस बात की होती है कि चीजें हमारे बस में नहीं होतीं। हम फिजूल में जीवन भर रस्साकशी करते रहते हैं, नियम तो नियम होते हैं।

लाजो का एक भाई था जो नटखट था। उसकी एक बहन भी थी जिसकी शादी होने वाली थी। उसका नाम मानवंती था। वह पन्द्रह की भी कहां ठीक से हो पायी थी। स्कूल में सब उसे चिढ़ाते -‘मानो का ब्याह होने वाला है। उसका घरवाला परचून की दुकान चलाता है। तब खूब मौज रहेगी मानो की। साबुन, तेल बगैरह के लिए बाजार नहीं जाना पड़ेगा।’

मानो शर्मा के भाग जाती। उसे क्या पता था कि विवाह केवल गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं होता, बल्कि इसके अलावा बहुत कुछ होता है। उसके सपने भी उन लड़कियों की तरह थे जिन्हें ससुराल में सुख और बेफ़िक्री की कामना होती है। समय के साथ-साथ उसका मन उल्लास से भरता जा रहा था। वह रंगीन ख्वाबों को हकीकत बनने का इंतजार कर रही थी। उसका मन कुछ सोचकर व्याकुल भी हो रहा था। वह एक आम लड़की की तरह सोच रही थी क्योंकि वह साधारण ही तो थी। उसका भाई मनोहर उससे कहता -‘मुझे जीजी भूल न जाना। मैं ऐसा कर नहीं पाऊंगा।’ मानो मनोहर को गले लगा लेती। मनोहर अपनी दीदी से चिपक जाता। बहनों का मन कितना होता है। हल्की सी बात का असर होता है। मानो चुपके से आंसू बहा देती। भाई की आंखें नम हो जातीं। दोनों को मालूम होता एक-दूसरे का दर्द - ये रिश्ता ऐसा ही होता है। भाई बहन की आंख में आंसू का एक कतरा नहीं देख सकता और बहन भी। बहन नहीं चाहती कि उसके भाई को कुछ हो - यह रिश्ता प्रेम के मजबूत धागे से बना होता है। धन्य है ऐसा रिश्ता।

जारी है ....

-Harminder Singh


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