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मुंह बंद और जेब खुली


बूढ़े काका कंबल ओढ़कर अलाव जला रहे थे। उनके हाथों की नसें साफ दिख रही थीं। यह बुढ़ापे की पहचान है कि जर्जर काया एक अलग कहानी बयान करती है।

  मैं उनके करीब जाकर बैठ गया। वे बोले,‘सूखी लकड़ियां तेजी से आग पकड़ रही हैं।’

मैंने कहा,‘ठीक इंसानों की तरह.....।’

काका ने एक पल मेरी ओर देखा, फिर बोले,‘यह नियम हमने थोड़े ही बनाया है।’ वे गंभीर हो चले थे।

इतने में मां दो प्याली चाय ले आयीं। इस बार पता नहीं क्यों काका ने उनसे बिस्कुट के लिए नहीं कहा। यह बहुत अजीब था।

चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने कहा,‘ये चाय बड़ा सुकून पहुंचाती है।’

वे दिन में कई बार चाय पीते हैं। मुझे बहुत खुशी होती है जब उन्हें चुस्की लेते हुए पाता हूं। यह मेरी खुशनसीबी है कि मैं वृद्धों के साथ कुछ समय बिता रहा हूं। मेरे कई परिचित मुझे यह तक कह देते हैं कि मैं चिंतक या विचारक की तरह व्यवहार करता हूं। इसलिए मुझे कहीं ओर होना चाहिए।

  काका ने कहा,‘बुढ़ापे में इंसान बोलता बहुत है। वह चुप रहना नहीं चाहता। कई लोग इसे यह भी कह देते हैं कि बूढ़ा सठिया गया। अब एक बात बताओ क्या हम बूढ़े बोल नहीं सकते?’

  मैंने कहा,‘बोलना बुरा नहीं। अपनी बात कहना सभी चाहते हैं। पर कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जो नयी पीढ़ी को भाती नहीं या वे उसे बर्दाश्त करते हुए असहज हो जाते हैं।’

  यह कई तरह की दुनिया की तस्वीर दिखाता है। एक दुनिया जिसमें नौजवान हैं जबकि दूसरी दुनिया बूढ़ों की है। पहली दुनिया में हर चीज तेजी से करने की ललक है तो दूसरी दुनिया थकी काया वालों की बेजान सी लगती है। एक में अनुभव की कमी है पर स्वयं को बहुत अनुभवी समझने का दावा किया जाता है। दूसरी ओर अनुभव का भंडार है जिसकी परख समझदारों द्वारा ही की जाती है।

  बूढ़े काका गंभीर होकर बोले,‘मुझे लगता है जैसे हम वृद्धों को संसार से अलग थलग किया जा चुका है। कोई सुनता ही नहीं हमारी। जितनी उम्र बढ़ती जा रही है अपने उतनी ही दूरी बढ़ाते जा रहे हैं। वैसे यह कोई हैरानी वाली बात भी नहीं। कहा जाता है कि मुंह बंद रखो और अपनी जेब खुली। पर वह क्या करे जिसकी जेब खाली हो?’

  सच में परिवार के लोग बूढ़ों से दूरी बना ही लेते हैं। अपना खून ही परायों सा व्यवहार करने पर उतारा हो जाये तो किसी दोष दिया जाये। यह एक चक्र की तरह लगने लगता है। हमने अपने वृद्ध सदस्यों को सम्मान और प्यार नहीं दिया। हम बूढ़े हुए तो हमारे साथ भी वही व्यवहार किया गया। यह चक्र की तरह ही तो है।

   वृद्धों की हिदायतें बकबक लगने लगती हैं। उनसे चुप रहने को कहा जाता है। मगर वे ऐसा कर नहीं पाते। उम्र बढ़ने के साथ अपनों की फ़िक्र भी कुछ अधिक हो जाती है। यह बुढ़ापा होता ही ऐसा है।


-Harminder Singh

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