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महिलायें और अंधविश्वास

अंधविश्वास महिलाओं में अधिक देखने को मिलता है। टोने-टोटके करने वालों के यहां आपको महिलायें ही अधिक संख्या में मिलेंगी। ऐसा लगता है जैसे ये चीजें सिर्फ उन्हीं के लिए बनी हैं। देवी-देवता और आस्था से जुड़े कर्मकाण्डों में महिलाओं की भागीदारी हमेशा अधिक रही है। इससे लगता है कि महिलाओं में आस्था और चमत्कारी कही जाने वाली शक्तियों के प्रति विश्वास इतना अधिक है कि वे उनके प्रति समर्पित सी हो गयी हैं।

महिलायें अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए तत्पर रहती हैं। सुख-शांति के लिए जब भी मौका मिलता है धार्मिक-कर्मकाण्ड करने से पीछे नहीं रहतीं। धार्मिक आयोजनों में महिलाओं की खासी भीड़ रहती है। वे चाहती हैं उनका परिवार खुशहाल रहे। यह शायद मजबूरी भी बन गयी या कुछ ओर कि वे अंधविश्वास में आसानी से जकड़ी जाती हैं।

औलाद की प्राप्ति के लिए बहुत सी महिलायें कितने साधु-संतों के फेर में पड़ जाती हैं। ऐसे मामले हर साल कितने सामने आते हैं जब महिलाओं को इन्हीं साधु भेषधारियों द्वारा ठगा जाता है। यहां तक कि उनके साथ अन्य प्रकार के घिनौने कृत्य तक करने से ऐसे ढोंगी लोग बाज नहीं आते। बेचारी विश्वास की मारी महिलायें एक दर से दूसरे दर भटकती हैं। पुरुषों का हालांकि उन्हें उतना सहयोग नहीं मिल पाता।

महिलायें भोली भी होती हैं। उनकी आस्था का लाभ भी जमकर उठाया जाता है। न जाने कितनी महिलायें अपनी मनौतियां पूरी करने के लिए जतन करती हैं। जादू-टोने वाले उन्हें उपाय बताते हैं। वे उन्हें अंजाम देती हैं। आखिर यह सब किसके लिए? अपने परिवार और अपनों के लिए।

-harminder singh

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