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बूंदों की छटपटाहट

एक आहट हुई है। कहीं कुछ टपका है। शायद कुछ टूटकर बिखरा है। हां, बूंद है वह। बूंद गिरी है धरती पर, बिखरकर, टूटकर। एक-एक कण को बारीकी से निहारा मैंने। संगीत था उनमें कोई। बहता चला गया जीवन। लय-ताल की खनक यहां भी चटकी। जिंदगी की कारस्तानी का अंदाज़े बयां यही है-सुरीला और बेजोड़।

गीत मेरे मन से उतरा। इतरायी हुई मिट्टी को शर्म आ गयी। यह अद्भुत है। संग चल रही लहरों पर गोता मैंने भी लगाया। बूंदों की चमक को खोने नहीं दिया। टिकाया माथे पर। बहती रही रेखायें बन आड़ी-तिरछी या इक्सार। मतवाली थीं, मैं मतवाला। मिलन हो गया। संगम सत् था। राग जो भी हो, मंगल जल-जल था।

महक उठी बगिया मेरी। चहक रही कोयल कोई। मद की फुहार में छन कर चटक रहीं बूंदे अनगिनत। संयोग-वियोग साथ। जीवन की चहक जारी थी।

-हरमिन्दर सिंह चाहल

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4 comments:

  1. कल 25/05/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    1. यशवंत जी आभार!

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  2. कंहीं संयोग तो कंही वियोग। बूंदों की ताल पर सजा गान।

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  3. आशा जी ,
    बूंदों का गीत निराला है। सुरीली तान बज रही है और देखो बूंदों इतरा रही हैं।
    आभार!

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