कहीं कोई बूढ़ा कराह रहा है क्या?

रोने का अनुभव किसी भी अवस्था में सही नहीं होता। खुशी के आंसू आने पर हमारा अनुभव अलग हो सकता है। दुख में हृदय भी रोता है।

उम्रदराज रोते हैं। उनकी भावनायें आहत होती हैं तो वे हृदय की दुखन को महसूस करते हैं। बेगाने हो रहे हैं उम्रदराज। उनके अपने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रहे हैं। यह जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है उनके लिए। रो रहे हैं अनगिनत बूढ़े। उनकी सुनवाई कहीं नहीं है।

वृद्धों की दशा को करीब से समझा जा सकता है लेकिन उनकी आंतरिक भावनाओं को समेटना मुश्किल है। वे बहती हैं एक धारा की तरह अविरल। टपकती धारायें दूसरों को भी अपनी आंखें नम करने पर मजबूर कर देती हैं। जीवन का यह सच बहुत ही क्रूर लगता है। क्रूर लगता है वह जब वृद्धों का उपहास किया जाता है।

दर्द होता हैं उन्हें भी। हां, वे भी सुबकते हैं। रोते हैं वे भी। बूढ़ी और जर्जर काया को ओढ़े ये वासी हममें से ही हैं, फिर क्यों हम इन्हें पराये कर देते हैं। क्या हमारे संस्कार हमें यही सिखाते हैं?

आखिर में नम आंखों के साथ मेरी एक कविता की पंक्तियां:

दर्द एक कोने से रिसा और रिसता चला गया,
घाव को अब मरहम की जरुरत है,
जर्जर होने के मायने जान चुका,
जिंदगी रुठकर चलती है,
अकेलापन मार रहा मुझे,
उपहास करता हर कोई है,
देख रहा संसार, दया है नहीं,
दर्द उठा जब सीने में तो बोले,
कहीं कोई बूढ़ा कराह रहा है क्या?

-harminder singh

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