गरमी भरी दोपहर

गरमी से मेरी सांस फूल रही थी। एक बार ऐसी स्थिति बन गयी थी कि मैं बेहोश हो जाता। लेकिन मैंने खुद को संभाला। यह सितम गरमी के कारण उपजा था। पसीने का बहना जब लगातार हो तो हमारा शरीर कमजोरी महसूस करने लगता है। तेज धूप और उमस के कारण मेरा हाल बेहाल था।

बस में भीड़ थी। पहुंचना समय से था इसलिये स्वयं को बलिदान करने के सिवा कोई चारा नहीं था। गनीमत रही कि अगले स्टाप पर तीन सवारियां कम हुईं। मुझे सहारा मिल गया। खिड़कियां खुले शीशों की थीं, इसलिये तेज हवा बस में दाखिल होकर पसीना खत्म करने का श्रेष्ठ कार्य कर रही थी। 

सड़क का निर्माण चल रहा था। रूट को एक लेन पर लाया गया। गाड़ियों की रफ्तार कम हो गयी थी। कई यात्री मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे थे- या तो गाने सुनने में, या समय देखने में जैसाकि मेरे पिताजी को सफर के दौरान आदत है। वे हर आधे घंटे में एक बार समय जरूर देखते हैं। उनका फोन साधारण है जिसमें हमारे-आपके फोन की तरह चमत्कारी "ऐप्स" नहीं। 

गरमी भरी उस दोपहर में रिक्शेवालों से यात्रियों को मोलभाव करते देखा। चिड़चिड़ाये लोगों को एक-दूसरे से भिड़ते हुये देखा। यह करम गरमी का था। 

-हरमिन्दर सिंह.

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