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गलियों की भीड़ और शोर


गलियों में निकलने पर आप महसूस करेंगे कि कैसे इलाके में आ गये। भीड़ और वाहनों का शोर शराबा, यही सब मिलेगा आपको यहां। 

लोगों ने स्वय रास्ते संकरे किये हुये हैं। इसमें प्रशासन को बिल्कुल जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दुकानों को सड़क तक ले जाने वाले दुकानदार खुद परेशान हैं क्योंकि उन्हें माल लाने ले जाने में दिक्कत आती है। इतने सब के वावजूद वे रास्तों को अपनी जागीर समझते हैं। यही कारण है कि ऐसी जगहों पर भीड़ अधिक होती है। 

पैदल लोग जैसे-तैसे निकल जाते हैं, मगर मोटर साइकिल सवार, रिक्शा चालकों आदि को मुश्किल का सामना करना पड़ता है। गलती से बड़ा वाहन आ गया तो वह पूरा रास्ता जाम कर देगा। 

मैंने लोगों के वाहनों को आपस में उलझते देखा है। हालांकि ऐसे मौकों पर मामूली कहासुनी तक बात निपट जाती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो ज्यादा उग्र हो जाते हैं। उनके कारण दूसरों को समस्या होती है। वे स्वयं अस्पताल तक जाने की करगुजारी करने से नहीं चूकते। 

एक रिक्शा वाला लकड़ी का सामान रख कर ले जा रहा था। एक जगह मिट्टी के ऊंचे ढेर पर चढ़ने के कारण रिक्शा पलट गया। चालक का बाल बांका नहीं हुआ, लेकिन दो राहगीर उसकी चपेट में आ गये। उन्हें चोटें आयी। मरहम-पट्टी का खर्च बेचारे रिक्शा चालक को देना पड़ा। 

वाहन बिना हार्न के कदम भर की दूरी भी तय नहीं कर सकते। शोर इतना हो जाता है कि शांति-पसंद लोगों के सिर में दर्द हो जायेगा। 

गलियों में गुजरने से आप लोगों की जिंदगी को करीब से देख सकते हैं। उसे महसूस कर सकते हैं। लगभग सभी तरह के लोगों से आपका आमना सामना हो जायेगा। 

बातचीत करने पर और परतें खुलेंगी। वहां की संस्कृति का पता चल जायेगा। यह अपने में एक अलग तरह का अनुभव होगा। 

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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