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बेटी होना अपराध न बन जाये कहीं


बदायूं की घटना ने दिल झकझोर कर रख दिया। उन मांओं की दर्द भरी चीखें क्या बयान कर रही हैं? एक बेटी ने ख्वाब सजाये आसमान में उड़ने के तो दूसरी भी खुले चमन की सैर चाहती होगी। गवाह है वह पेड़ जिसपर उनके शव लटकाये गये, लेकिन वे मौन रहेंगे।

अमानवीय हो रहा है यह जब बहन-बेटियों को जिंदगी भर का न सहने वाला दर्द दिया जा रहा है या उनकी जिंदगी को मिटाया जा रहा है। हमारे बीच हैं वे लोग जो ऐसा कर रहे हैं। जिंदा को लाश बनाने की जैसे उन्होंने ठान ली है।

गांव का एक बूढ़ा व्यक्ति डबडबायी आंखों से बोला,‘कौन क्या करे? कोई सुने न हमारी? किसके पास जायें, दुत्कार मिले सिवाय न कुछ।’

उन मासूस लड़कियों की आंखें भी शांत थीं जो कभी उन बेटियों के साथ बैठी-हंसी थीं। शायद वे भी सोच रही हों कि बेटी होना अपराध न बन जाये कहीं।

हरमिन्दर सिंह

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