सफरनामा: गजरौला से मुरादाबाद


सुबह साढ़े आठ बजे दौड़कर रेलवे स्टेशन पहुंचा। टिकट खिड़की पर उतनी भीड़ नहीं थी। पिछली बार लोगों की कतार को देखकर मैं हैरान रह गया था। कारण जो भी हो मुझे टिकट मिलने में मुश्किल से पांच मिनट का समय लगा। एक लड़की टिकट खिड़की से मुझसे पहले टिकट लेने के कारण मेरा हाथ पीछे छिटक चुकी थी, मगर पैसे पहले मैंने दिये, टिकट मुझे मिला। जल्दी उसे इतनी क्यों थी जबकि हम दोनों को जाना मुरादाबाद ही था।

वेटिंग रुम में चहल-पहल न के बराबर थी। प्लेटफाॅर्म पर लोगों की कोई भीड़ नहीं थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि लोग नजर क्यों नहीं आ रहे। क्या गरमी इसकी वजह है? क्या बढ़ा किराया इसका कारण है?

पहले पैसेंजर ट्रेन आकर रुकी। कुछ लोग उस ओर लपके। मुझे मालूम था कि एक्सप्रेस गंतव्य तक समय से पहुंच जायेगी। पैसेंजर वैसे भी रेंग-रेंग कर चलने में विख्यात है। कई मुसाफिर जिनके पास एक्सप्रेस का टिकट था वे भी जल्दी के चक्कर में उसमें सवार हो लिये। परिणाम बाद में आने थे जिसके बाद वे कभी भी इस तरह जल्दबाजी नहीं दिखायेंगे।

आधा घंटा इंतजार करने के बाद हमारी ट्रेन आ गयी जिसके ज्यादातर डिब्बे स्लीपर क्लास थे। इक्का-दुक्का जनरल कोच थे। भीड़ के मारे बुरा हाल था। मैं सीट ढूंढने की सोच नहीं सकता था इसलिए जहां जगह मिली वहां खड़ा हो गया। डिब्बे के गेट के किनारे खड़े होकर यात्रा मैंने पहले भी कई दफा की है। छोटे सफर के लिए यह कोई परेशानी वाली बात नहीं। हां, लंबे सफर में जरुर समस्या उत्पन्न हो सकती है। टांगों का जबाव देना पक्का है। एक या दो घंटे का सफर खड़े होकर आसानी से किया जा सकता है, जबकि तीन या चार घंटे के सफर में परेशानी महसूस हुये बिना नहीं रहेगी।

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अमरोहा स्टेशन पर तीन युवक सवार हुए। आते ही उन्होंने बोलना शुरु कर दिया। गेट की सीडि़यों पर बैठने की उनकी पुरानी आदत होगी। उनकी बातचीत का आधार समझ नहीं आया, लेकिन वे बिना किसी विषय के बोले जा रहे थे। बीच-बीच में हो-हल्ला भी करते रहते। स्थानीय होने का लाभ यह है कि आपका अधिकार सा हो जाता है ट्रेनों में। अपने घर में आप इतना कभी बोले हों, लेकिन ट्रेन आपका अपना घर है जिसमें आप यात्रा नहीं कर रहे, यात्रा के साथ जमकर मस्ती कर रहे हैं।

अगले स्टेशन पर ट्रेन धीमी हुई तो गेट पर खड़े उन नौजवानों ने दूर से ही शोर मचाना शुरु कर दिया। उन्हें पैसेंजर ट्रेन स्टेशन पर खड़ी दिख गयी थी। उनके कुछ साथी जो पहले चल दिये थे स्टेशन पर खड़े थे। ट्रेन रुकते ही पांच-छह युवक उसमें सवार हो गये। अब उनका एक जत्था हो गया था जिसमें लगभग आठ-नौ लोग थे। जो लोग पैसेंजर से आये थे उनकी उन्होंने खिल्ली उड़ाई, जमकर उड़ाई। दरअसल पैसेंजर सभी स्टेशनों पर रुकती जाती है। उसे एक्सप्रेस आदि गाडि़यों के लिए रुट क्लियर के लिए कहीं भी रोक दिया जाता है। जबतक दूसरी गाड़ी पास नहीं होती, पैसेंजर ट्रेन को इंतजार करना पड़ता। कभी-कभी यह इंतजार घंटों तक हो जाता है।

उस समय ऐसी स्थिति थी कि मेरे लिए खड़ा होना मुश्किल हो गया था। भीड़ बढ़ गयी थी। चूंकि मेरी लंबाई ठीक-ठाक है, इसलिए मुझे सांस लेने में कोई दिक्कत नहीं आयी। हर तरफ पसीने की गंध ने बुरा हाल किया था। पसीना मुझे भी आ रहा था, वह किसी ओर को बुरा लग रहा होगा। रुकी रेलगाड़ी में यह समस्या विकराल रुप ले लेती है। घुटन और गरमी के कारण मानो दम निकल जाता है। ट्रेन चलने पर थोड़ी राहत मिलती है।

एक वृद्धा नीचे बैठ गयी। उसमें इतनी क्षमता नहीं थी कि वह अपने बुढ़ापे के कारण और देर तक दोनों टांगों पर शरीर का भार उठा सके। ट्रेन मुरादाबाद लगभग आधा घंटे में पहुंचने वाली थी। वह वृद्धा ट्रेन के रुकने तक उसी तरह बैठी रही। इससे उसे राहत जरुर मिली होगी। मुझे हैरानी इस बात की है कि उसे किसी ने बैठने के लिए सीट का बचा हिस्सा भी नहीं दिया। मेरी नजर उसपर बाद में पड़ी जब ट्रेन में निकलने भर की जगह नहीं थी।

आखिरकार मुरादाबाद स्टेशन आ गया। मैंने देखा कि जिंदगी की भागदौड़ में हर कोई लगा है। किसी को किसी के बारे में जानने या समझने की जरुरत नहीं क्योंकि हर किसी के कदम गतिमान हैं। प्लेटफाॅर्म पर लोग होते हैं। इधर-उधर दौड़ती जिंदगियां नये की तलाश में होती हैं। शोर होता है और अनगिनत विचार भी। लेकिन बिना जाने पहचाने दौड़ जारी रहती है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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